महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1516, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकितने ही दानव पूर्वकालमें अपने पूर्वजोंद्वारा सुयोग्य ब्राह्मणोंको दानके रूपमें दी हुई जागीरें नास्तिकताके कारण उनके पास रहने नहीं देते हैं यद्यपि वे अन्य सम्भव उपायोंसे जीवन-निर्वाह कर सकते हैं तथापि उस दिये हुए दानको छीन लेते हैं ।। ६९ १/३ ।।
मित्रेणाभ्यर्थितं मित्रमर्थसंशयिते क्वचित् ।। ७० ।।
वालकोट्यग्रमात्रेण स्वार्थेनाघ्नत तद् वसु ।
कहीं धनके विषयमें संशय उपस्थित होनेपर अर्थात् यह धन न्यायतः मेरा है या दूसरेका, यह प्रश्न खड़ा होनेपर यदि उस धनका अधिकारी व्यक्ति अपने किसी मित्रसे प्रार्थना करता है कि वह पंचायतद्वारा इस मामलेको निपटा दे तो वह मित्र अपने बालकी नोकके बराबर स्वार्थके लिये भी उसकी उस सम्पत्तिको चौपट कर देता है ।। ७० १/३ ।।
परस्वादानरुचयो विपणव्यवहारिणः ।। ७१ ।।
अदृश्यन्तार्यवर्णेषु शूद्राश्चापि तपोधनाः ।
दानवोंके यहाँ जो व्यापारी हैं, वे सदा दूसरोंका धन ठग लेनेका ही विचार रखते हैं तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंमें शूद्र भी मिलकर तपोधन बन बैठे हैं ।। ७१ १/३ ।।
अधीयतेऽव्रताः केचिद् वृथा व्रतमथापरे ।। ७२ ।।
कुछ लोग ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन किये बिना ही वेदोंका स्वाध्याय करते हैं, कुछ लोग व्यर्थ (अवैदिक) व्रतका आचरण करते हैं ।। ७२ ।।
अशुश्रूषुर्गुरोः शिष्यः कश्चिच्छिष्यसखो गुरुः ।
शिष्य गुरुकी सेवा करना नहीं चाहता। कोई-कोई गुरु भी ऐसा है जो शिष्योंको दोस्त बनाकर रखता है ।।
पिता चैव जनित्री च श्रान्तौ वृत्तोत्सवाविव ।। ७३ ।।
अप्रभुत्वे स्थितौ वृद्धावन्नं प्रार्थयतः सुतान् ।
जब पिता और माता उत्सवशून्यकी भाँति थक जाते हैं, तब घरमें उनकी कोई प्रभुता नहीं रह जाती। वे दोनों बूढ़े दम्पति बेटोंसे अन्नकी भीख माँगते हैं ।। ७३ १/३ ।।
तत्र वेदविदः प्राज्ञा गाम्भीर्ये सागरोपमाः ।। ७४ ।।
कृष्यादिष्वभवन् सक्ता मूर्खाः श्राद्धान्यभुञ्जत ।
वहाँ जो वेदवेत्ता ज्ञानी तथा गम्भीरतामें समुद्रके समान पुरुष हैं, वे तो खेती आदि कार्योंमें संलग्न हो गये हैं और मूर्खलोग श्राद्धान्न खाते फिरते हैं ।। ७४ १/३ ।।
प्रातः प्रातश्च सुप्रश्नं कल्पनं प्रेषणक्रियाः ।। ७५ ।।
शिष्यानप्रहितास्तेषामकुर्वन् गुरवः स्वयं ।