भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1517

गुरुलोग प्रतिदिन प्रातःकाल जाकर शिष्योंसे पूछते हैं कि आपकी रात सुखसे बीती है न? इसके सिवा वे उन शिष्योंके वस्त्र आदि ठीकसे पहनाते और उनकी वेश-भूषा सँवारते हैं तथा उनकी ओरसे कोई प्रेरणा न होनेपर भी स्वयं ही उनके संदेशवाहक दूत आदिका कार्य करते हैं ।। ७५ १/२ ।।

श्वश्रूश्वशुरयोरग्रे वधूः प्रेष्यानशासत ।। ७६ ।। अन्वशासच्च भर्तारं समाहूयाभिजल्पति । सास-ससुरके सामने ही बहू सेवकोंपर शासन करने लगी है। वह पतिको भी आदेश देती है और सबके सामने पतिको बुलाकर उससे बात करती है ।। ७६ १/२ ।।

प्रयत्नेनापि चारक्षच्चित्तं पुत्रस्य वै पिता ।। ७७ ।। व्यभजच्चापि संरम्भाद् दुःखवासं तथावसत् । पिता विशेष प्रयत्नपूर्वक पुत्रका मन रखते हैं। वे उनके क्रोधसे डरकर सारा धन पुत्रोंको बाँट देते हैं और स्वयं बड़े कष्टसे जीवन बिताते हैं ।। ७७ १/२ ।।

अग्निदाहेन चौरैर्वा राजभिर्वा हृतं धनम् ।। ७८ ।। दृष्ट्वा द्वेषात् प्राहसन्त सुहृत्सम्भाविता ह्यपि । जिन्हें हितैषी और मित्र समझा जाता था, वे ही लोग जब अपने सम्बन्धीके धनको आग लगने, चोरी हो जाने अथवा राजाके द्वारा छिन जानेसे नष्ट हुआ देखते हैं, तब द्वेषवश उसकी हँसी उड़ाते हैं ।। ७८ १/२ ।।

कृतघ्ना नास्तिकाः पापा गुरुदाराभिमर्शिनः ।। ७९ ।। अभक्ष्यभक्षणरता निर्मर्यादा हतत्विषः । दैत्यगण कृतघ्न, नास्तिक, पापाचारी तथा गुरुपत्नीगामी हो गये हैं। जो चीज नहीं खानी चाहिये, वे भी खाते और धर्मकी मर्यादा तोड़कर मनमाने आचरण करते हैं। इसीलिये वे कान्तिहीन हो गये हैं ।। ७९ १/२ ।।

तेष्वेवमादीनाचारानाचरत्सु विपर्यये ।। ८० ।। नाहं देवेन्द्र वत्स्यामि दानवेष्विति मे मतिः । देवेन्द्र! जबसे इन दैत्योंने ये धर्मके विपरीत आचरण अपनाये हैं, तबसे मैंने यह निश्चय कर लिया है कि अब इन दानवोंके घरमें नहीं रहूँगी ।। ८० १/२ ।।

तन्मां स्वयमनुप्राप्तामभिनन्द शचीपते ।। ८१ ।। त्वयार्चितां मां देवेश पुरो धास्यन्ति देवताः । शचीपते! देवेश्वर! इसीलिये मैं स्वयं तुम्हारे यहाँ आयी हूँ। तुम मेरा अभिनन्दन करो। तुमसे पूजित होनेपर मुझे अन्य देवता भी अपने सम्मुख स्थापित (एवं सम्मानित) करेंगे ।। ८१ १/२ ।।

यत्राहं तत्र मत्कान्ता मद्विशिष्टा मदर्पणाः ।। ८२ ।।