महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1518, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्त देव्यो जयाष्टम्यो वासमेष्यन्ति तेऽष्टधा । जहाँ मैं रहूँगी, वहाँ सात देवियाँ और निवास करेंगी, उन सबके आगे आठवीं जया देवी भी रहेंगी। ये आठों देवियाँ मुझे बहुत प्रिय हैं, मुझसे भी श्रेष्ठ हैं और मुझे आत्मसमर्पण कर चुकी हैं ॥ ८२ १/२ ॥
आशा श्रद्धा धृतिः शान्तिर्विजितिः संनतिः क्षमा ॥ ८३ ॥ अष्टमी वृत्तिरेतासां पुरोगा पाकशासन । पाकशासन! उन देवियोंके नाम इस प्रकार हैं—आशा, श्रद्धा, धृति, शान्ति, विजिति, संनति, क्षमा और आठवीं वृत्ति (जया)। ये आठवीं देवी उन सातोंकी अग्रगामिनी हैं ॥ ८३ १/२ ॥
ताश्चाहं चासुरांस्त्यक्त्वा युष्मद्विषयमागताः ॥ ८४ ॥ त्रिदशेषु निवत्स्यामो धर्मनिष्ठान्तरात्मसु । वे देवियाँ और मैं सब-के-सब उन असुरोंको त्यागकर तुम्हारे राज्यमें आयी हैं। देवताओंकी अन्तरात्मा धर्ममें निष्ठा रखनेवाली है; इसलिये अब हमलोग इन्हींके यहाँ निवास करेंगी ॥ ८४ १/२ ॥
इत्युक्तवचनां देवीं प्रीत्यर्थं च ननन्दतुः ॥ ८५ ॥ नारदश्चात्र देवर्षिर्वृत्रहन्ता च वासवः । (भीष्मजी कहते हैं—) लक्ष्मीदेवीके इस प्रकार कहनेपर देवर्षि नारद तथा वृत्रहन्ता इन्द्रने उनकी प्रसन्नताके लिये उनका अभिनन्दन किया ॥ ८५ १/२ ॥
ततोऽनलसखो वायुः प्रववौ देववर्त्मसु ॥ ८६ ॥ इष्टगन्धः सुखस्पर्शः सर्वेन्द्रियसुखावहः । उस समय देवमार्गोंपर मनोरम गन्ध और सुखद स्पर्शसे युक्त तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंको आनन्द प्रदान करनेवाले वायुदेव, जो अग्निदेवताके मित्र हैं, मन्दगतिसे बहने लगे ॥ ८६ १/२ ॥
शुचौ वाभ्यर्थिते देशे त्रिदशाः प्रायशः स्थिताः ॥ ८७ ॥ लक्ष्मीसहितमासीनं मघवन्तं दिदृक्षवः ॥ ८८ ॥ उस परम पवित्र एवं मनोवाञ्छित प्रदेशमें राजलक्ष्मीसहित इन्द्रदेवका दर्शन करनेके लिये प्रायः सभी देवता उपस्थित हो गये ॥ ८७-८८ ॥
ततो दिवं प्राप्य सहस्रलोचनः श्रीयोपपन्नः सुहृदा महर्षिणा । रथेन हर्यश्वयुजा सुरर्षभः सदः सुराणामभिसत्कृतो ययौ ॥ ८९ ॥