महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1523, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनका ज्ञान परिपक्व होता है। वे महाज्ञानी, क्रोधको जीतनेवाले और जितेन्द्रिय होते हैं तथा मन, वाणी और शरीरसे कभी किसीका अपराध नहीं करते हैं ॥ १२ ॥ अनीर्षवो न चान्योन्यं विहिंसन्ति कदाचन । न च जातूपतप्यन्ते धीराः परसमृद्धिभिः ॥ १३ ॥ उनके मनमें एक-दूसरेके प्रति ईर्ष्या नहीं होती। वे कभी हिंसा नहीं करते तथा वे धीर पुरुष दूसरोंकी समृद्धियोंसे कभी मन-ही-मन जलते नहीं हैं ॥ १३ ॥ निन्दाप्रशंसे चात्यर्थं न वदन्ति परस्य ये । न च निन्दाप्रशंसाभ्यां विक्रियन्ते कदाचन ॥ १४ ॥ वे दूसरोंकी न तो निन्दा करते हैं और न अधिक प्रशंसा ही। उनकी भी कोई निन्दा या प्रशंसा करे तो उनके मनमें कभी विकार नहीं होता है ॥ १४ ॥ सर्वतश्च प्रशान्ता ये सर्वभूतहिते रताः । न क्रुध्यन्ति न हृष्यन्ति नापराध्यन्ति कर्हिचित् ॥ १५ ॥ वे सर्वथा शान्त और सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते हैं, न कभी क्रोध करते हैं, न हर्षित होते हैं और न किसीका अपराध ही करते हैं ॥ १५ ॥ विमुच्य हृदयग्रन्थिं चङ्क्रमन्ति यथासुखम् । न येषां बान्धवाः सन्ति ये चान्येषां न बान्धवाः ॥ १६ ॥ वे हृदयकी अज्ञानमयी गाँठ खोलकर चारों ओर आनन्दके साथ विचरा करते हैं। न उनके कोई भाई-बन्धु होते हैं और न वे ही दूसरोंके भाई-बन्धु होते हैं ॥ १६ ॥ अमित्राश्च न सन्त्येषां ये चामित्रा न कस्यचित् । य एवं कुर्वते मर्त्याः सुखं जीवन्ति सर्वदा ॥ १७ ॥ न उनके कोई शत्रु होते हैं और न वे ही किसीके शत्रु होते हैं। जो मनुष्य ऐसा करते हैं, वे सदा सुखसे जीवन बिताते हैं ॥ १७ ॥ ये धर्मं चानुरुध्यन्ते धर्मज्ञा द्विजसत्तम । ये ह्यतो विच्युता मार्गात् ते हृष्यन्त्युद्विजन्ति च ॥ १८ ॥ द्विजश्रेष्ठ! जो धर्मके अनुसार चलते हैं, वे ही धर्मज्ञ हैं। तथा जो धर्ममार्गसे भ्रष्ट हो जाते हैं, उन्हें ही हर्ष-उद्वेग आदि प्राप्त होते हैं ॥ १८ ॥ आस्थितस्तमहं मार्गमसूयिष्यामि कं कथम् । निन्द्यमानः प्रशस्तो वा हृष्येऽहं केन हेतुना ॥ १९ ॥ मैंने भी उसी धर्ममार्गका अवलम्बन किया है; अतः अपनी निन्दा सुनकर क्यों किसीके प्रति द्वेष-दृष्टि करूँ? अथवा प्रशंसा सुनकर भी किसलिये हर्ष मानूँ? ॥ १९ ॥ यद् यदिच्छन्ति तत् तस्मादपि गच्छन्तु मानवाः । न मे निन्दाप्रशंसाभ्यां ह्रासवृद्धी भविष्यतः ॥ २० ॥