भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1524

मनुष्य निन्दा और प्रशंसामेंसे जिससे जो-जो लाभ उठाना चाहते हों, उससे वह-वह लाभ उठा लें। उस निन्दा और प्रशंसासे न मेरी कोई हानि होगी, न लाभ ॥ २० ॥ अमृतस्येव संतृप्येद्पवमानसय तत्त्ववित् । विषस्येवोद्विजेन्नित्यं सम्मानस्य विचक्षणः ॥ २१ ॥ तत्त्वज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह अपमानको अमृतके समान समझकर उससे संतुष्ट हो और विद्वान् मनुष्य सम्मानको विषके तुल्य समझकर उससे सदा डरता रहे ॥ अवज्ञातः सुखं शेते इह चामुत्र चाभयम् । विमुक्तः सर्वदोषेभ्यो योऽवमन्ता स बध्यते ॥ २२ ॥ सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त महात्मा पुरुष अपमानित होनेपर भी इस लोक और परलोकमें निर्भय होकर सुखसे सोता है; परंतु उसका अपमान करनेवाला पुरुष पापाबन्धनमें पड़ जाता है ॥ २२ ॥ परां गतिं च ये केचित् प्रार्थयन्ति मनीषिणः । एतद् व्रतं समाश्रित्य सुखमेधन्ति ते जनाः ॥ २३ ॥ जो मनीषी पुरुष उत्तम गति प्राप्त करना चाहते हैं, वे इस उत्तम व्रतका आश्रय लेकर सुखी एवं अभ्युदयशील होते हैं ॥ २३ ॥ सर्वतश्च समाहृत्य क्रतून् सर्वान् जितेन्द्रियः । प्राप्नोति ब्रह्मणः स्थानं यत्परं प्रकृतेर्ध्रुवम् ॥ २४ ॥ मनुष्यको चाहिये कि सारे काम्य-कर्मोंका परित्याग करके सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें कर ले। फिर वह प्रकृतिसे परे अविनाशी ब्रह्मपदको प्राप्त हो जाता है ॥ २४ ॥ नास्य देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः । पदमन्ववरोहन्ति प्राप्तस्य परमां गतिम् ॥ २५ ॥ परमगतिको प्राप्त हुए उस ज्ञानी महात्माके पदका अनुसरण न देवता कर पाते हैं न गन्धर्व, न पिशाच कर पाते हैं और न राक्षस ही ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि जैगीषव्यासितसंवादे एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें जैगीषव्य और असित-देवलसंवादविषयक दो सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२९ ॥