भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1530, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1530

भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें भगवान् व्यासने अपने पुत्रके पूछनेपर जो उपदेश दिया था, वही प्राचीन इतिहास मैं दोहराऊँगा ॥ ६ ॥ अधीत्य वेदानखिलान् साङ्गोपनिषदस्तथा । अन्विच्छन्नैष्ठिकं कर्म धर्मनैपुणदर्शनात् ॥ ७ ॥ कृष्णद्वैपायनं व्यासं पुत्रो वैयासकिः शुकः । पप्रच्छ संदेहमिमं छिन्नधर्मार्थसंशयम् ॥ ८ ॥ अंगों और उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करके व्यासपुत्र शुकदेवने नैष्ठिक कर्मको जाननेकी इच्छासे अपने पिता श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासकी धर्मज्ञानविषयक निपुणता देखकर उनसे अपने मनका संदेह पूछा। उन्हें यह विश्वास था कि पिताजीके उपदेशसे मेरा धर्म और अर्थविषयक सारा संशय दूर हो जायगा ॥ ७-८ ॥

श्रीशुक उवाच भूतग्रामस्य कर्तारं कालज्ञाने च निश्चयम् । ब्राह्मणस्य च यत् कृत्यं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ९ ॥ श्रीशुकदेवजी बोले— पिताजी! समस्त प्राणि-समुदायको उत्पन्न करनेवाला कौन है? कालके ज्ञानके विषयमें आपका क्या निश्चय है? और ब्राह्मणका क्या कर्तव्य है? ये सब बातें आप बतानेकी कृपा करें ॥ ९ ॥

भीष्म उवाच तस्मै प्रोवाच तत् सर्वं पिता पुत्राय पृच्छते । अतीतानागते विद्वान् सर्वज्ञः सर्वधर्मवित् ॥ १० ॥ भीष्मजी कहते हैं— राजन्! भूत और भविष्यके ज्ञाता तथा सम्पूर्ण धर्मोंको जाननेवाले सर्वज्ञ विद्वान् पिता व्यासने अपने पुत्रके पूछनेपर उसे उन सब बातोंका इस प्रकार उपदेश किया ॥ १० ॥

व्यास उवाच अनाद्यन्तमजं दिव्यमजरं ध्रुवमव्ययम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं ब्रह्माग्ने सम्प्रवर्तते ॥ ११ ॥ व्यासजी बोले— बेटा! सृष्टिके आरम्भमें अनादि, अनन्त, अजन्मा, दिव्य, अजर-अमर, ध्रुव, अविकारी, अतर्क्य और ज्ञानातीत ब्रह्म ही रहता है ॥ ११ ॥ काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव त्रिंशत्तु काष्ठा गणयेत् कलां ताम् । त्रिंशत्कलश्चापि भवेन्मुहूर्तो भागः कलाया दशमश्च यः स्यात् ॥ १२ ॥

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