महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1531, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें(अब कालका विभाग इस प्रकार समझना चाहिये) पंद्रह निमेषकी एक काष्ठा और तीस काष्ठाकी एक कला गिननी चाहिये। तीस कलाका एक मुहूर्त होता है। उसके साथ कलाका दसवाँ भाग और सम्मिलित होता है अर्थात् तीस कला और तीन काष्ठाका एक मुहूर्त होता है ।। १२ ।।
त्रिंशन्मुहूर्तं तु भवेदहश्च रात्रिश्श्च संख्या मुनिभिः प्रणीता । मासः स्मृतो रात्र्यहनी च त्रिंशत् संवत्सरो द्वादशमास उक्तः ॥ १३ ॥
तीस मुहूर्तका एक दिन-रात होता है। महर्षियोंने दिन और रात्रिके मुहूर्तोंकी संख्या उतनी ही बतायी है। तीस रात-दिनका एक मास और बारह मासोंका एक संवत्सर बताया गया है ।। १३ ।।
संवत्सरं द्वे त्वयने वदन्ति संख्याविदो दक्षिणमुत्तरं च ॥ १४ ॥
विद्वान् पुरुष दो अयनोंको मिलाकर एक संवत्सर कहते हैं। वे दो अयन हैं—उत्तरायण और दक्षिणायन ।। १४ ।।
अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके । रात्रिः स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामहः ।। १५ ।।
मनुष्यलोकके दिन-रातका विभाग सूर्यदेव करते हैं। रात प्राणियोंके सोनेके लिये है और दिन काम करनेके लिये ।। १५ ।।
पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस्तयोः पुनः । शुक्लोऽहः कर्मचेष्टायां कृष्णः स्वप्नाय शर्वरी ।। १६ ।।
मनुष्योंके एक मासमें पितरोंका एक दिन-रात होता है। शुक्लपक्ष उनके काम-काज करनेके लिये दिन है और कृष्णपक्ष उनके विश्रामके लिये रात है ।। १६ ।।
दैवे रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः । अहस्तत्रोदगयनं रात्रिः स्याद् दक्षिणायनम् ।। १७ ।।
मनुष्योंका एक वर्ष देवताओंके एक दिन-रातके बराबर है, उनके दिन-रातका विभाग इस प्रकार है। उत्तरायण उनका दिन है और दक्षिणायन उनकी रात्रि ।। १७ ।।
ये ते रात्र्यहनी पूर्वं कीर्तिते जीवलौकिके । तयोः संख्याय वर्षाग्रं ब्राह्मे वक्ष्याम्यहःक्षपे ।। १८ ।। पृथक् संवत्सराग्राणि प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः । कृते त्रेतायुगे चैव द्वापरे च कलौ तथा ।। १९ ।।
पहले मनुष्योंके जो दिन-रात बताये गये हैं, उन्हींकी संख्याके हिसाबसे अब मैं ब्रह्माके दिन-रातका मान बताता हूँ। साथ ही सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चारों