भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 156

'देश और कालकी प्रतीक्षा करनेवाला जो राजा शास्त्रीय बुद्धिका आश्रय ले लुटेरोंके अपराधको धैर्यपूर्वक सहन करता है अर्थात् उनको दण्ड देनेमें जल्दी नहीं करता, समयकी प्रतीक्षा करता है, वह पापसे लिप्त नहीं होता ।। आदाय बलिषड्भागं यो राष्ट्रं नाभिरक्षति । प्रतिगृह्णाति तत् पापं चतुर्थांशेन भूमिपः ।। १२ ।। 'जो प्रजाकी आयका छठा भाग करके रूपमें लेकर भी राष्ट्रकी रक्षा नहीं करता है, वह राजा उसके चौथाई पापको मानो ग्रहण कर लेता है ।। १२ ।। निबोध च यथाऽऽतिष्ठन् धर्मान्न च्यवते नृपः । निग्रहाद् धर्मशास्त्राणामनुरुद्ध्यन्नपेतभीः ।। १३ ।। 'मेरी वह बात सुनो, जिसके अनुसार चलनेवाला राजा धर्मसे नीचे नहीं गिरता। धर्मशास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लंघन करनेसे राजाका पतन हो जाता है और यदि धर्मशास्त्रका अनुसरण करता है तो वह निर्भय होता है ।। कामक्रोधावनादृत्य पितेव समदर्शनः । शास्त्रजां बुद्धिमास्थाय युज्यते नैनसा हि सः ।। १४ ।। 'जो काम और क्रोधकी अवहेलना करके शास्त्रीय विधिका आश्रय ले सर्वत्र पिताके समान समदृष्टि रखता है, वह कभी पापसे लिप्त नहीं होता ।। १४ ।। दैवेनाभ्याहतो राजा कर्मकाले महाद्युते । न साधयति यत् कर्म न तत्राहुरतिक्रमम् ।। १५ ।। 'महातेजस्वी युधिष्ठिर! दैवका मारा हुआ राजा कार्य करनेके समय जिस कार्यको नहीं सिद्ध कर पाता, उसमें उसका कोई दोष या अपराध नहीं बताया जाता है ।। तरसा बुद्धिपूर्वं वा निग्राह्या एव शत्रवः । पापैः सह न संदध्याद् राज्यं पण्यं न कारयेत् ।। १६ ।। 'शत्रुओंको अपने बल और बुद्धिसे काबूमें कर ही लेना चाहिये। पापियोंके साथ कभी मेल नहीं करना चाहिये। अपने राज्यको बाजारका सौदा नहीं बनाना चाहिये ।। शूराश्चार्याश्च सत्कार्या विद्वांसश्च युधिष्ठिर । गोमिनो धनिनश्चैव परिपाल्या विशेषतः ।। १७ ।। 'युधिष्ठिर! शूरवीरों, श्रेष्ठ पुरुषों तथा विद्वानोंका सत्कार करना बहुत आवश्यक है। अधिक-से-अधिक गौएँ रखनेवाले धनी वैश्योंकी विशेषरूपसे रक्षा करनी चाहिये ।। १७ ।। व्यवहारेषु धर्मेषु योक्तव्याश्च बहुश्रुताः । (प्रमाणज्ञा महीपाल न्यायशास्त्रावलम्बिनः । वेदार्थतत्त्वविद् राजंस्तर्कशास्त्रबहुश्रुताः ।। मन्त्रे च व्यवहारे च नियोक्तव्या विजानता ।