भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 157

'जो बहुज्ञ विद्वान् हों, उन्हींको धर्म तथा शासन-कार्योंमें लगाना चाहिये। भूपाल! जो

प्रमाणोंके ज्ञाता, न्यायशास्त्रका अवलम्बन करनेवाले, वेदोंके तत्त्वज्ञ तथा तर्कशास्त्रके

बहुश्रुत विद्वान् हों, उन्हींको विज्ञ पुरुष मन्त्रणा तथा शासन-कार्यमें लगाये ।।

तर्कशास्त्रकृता बुद्धिर्धर्मशास्त्रकृता च या ।।

दण्डनीतिकृता चैव त्रैलोक्यमपि साधयेत् ।

'तर्कशास्त्र, धर्मशास्त्र तथा दण्डनीतिसे प्रभावित हुई बुद्धि तीनों लोकोंकी भी सिद्धि

कर सकती है ।।

नियोज्या वेदतत्त्वज्ञा यज्ञकर्मसु पार्थिव ।।

वेदज्ञा ये च शास्त्रज्ञास्ते च राजन् सुबुद्धयः ।

'राजन्! भूपाल! जो वेदोंके तत्त्वज्ञ, वेदज्ञ, शास्त्रज्ञ तथा उत्तम बुद्धिसे सम्पन्न हों, उन्हें

यज्ञकर्मोंमें नियुक्त करना चाहिये ।।

आन्वीक्षिकीत्रयीवार्तादण्डनीतिषु पारगाः ।

ते तु सर्वत्र योक्तव्यास्ते च बुद्धेः परं गताः ।।)

गुणयुक्तेऽपि नैकस्मिन् विश्वसेत विचक्षणः ।। १८ ।।

'आन्वीक्षिकी (वेदान्त), वेदत्रयी, वार्ता तथा दण्डनीतिके जो पारंगत विद्वान् हों, उन्हें

सभी कार्योंमें नियुक्त करना चाहिये; क्योंकि वे बुद्धिकी पराकाष्ठाको पहुँचे हुए होते हैं। एक

व्यक्ति कितना ही गुणवान् क्यों न हो, विद्वान् पुरुषको उसपर विश्वास नहीं करना

चाहिये ।। १८ ।।

अरक्षिता दुर्विनीतो मानी स्तब्धोऽभ्यसूयकः ।

एनसा युज्यते राजा दुर्दान्त इति चोच्यते ।। १९ ।।

'जो राजा प्रजाकी रक्षा नहीं करता, जो उद्दण्ड, मानी, अकड़ रखनेवाला और दूसरोंके

दोष देखनेवाला है, वह पापसे संयुक्त होता है और लोग उसे दुर्दान्त कहते हैं ।। १९ ।।

येऽरक्ष्यमाणा हीयन्ते दैवेनाभ्याहता नृप ।

तस्करैश्चापि हीयन्ते सर्वं तद् राजकिल्बिषम् ।। २० ।।

'नरेश्वर! जो लोग राजाकी ओरसे सुरक्षित न होनेके कारण अनावृष्टि आदि दैवी

आपत्तियोंसे तथा चोरोंके उपद्रवसे नष्ट हो जाते हैं, उनके इस विनाशका सारा पाप राजाको

ही लगता है ।। २० ।।

सुमन्त्रिते सुनीते च सर्वतश्चोपपादिते ।

पौरुषे कर्मणि कृते नास्त्यधर्मो युधिष्ठिर ।। २१ ।।

'युधिष्ठिर! अच्छी तरह मन्त्रणा की गयी हो, सुन्दर नीतिसे काम लिया गया हो और

सब ओरसे पुरुषार्थपूर्वक प्रयत्न किये गये हों (उस अवस्थामें यदि प्रजाको कोई कष्ट हो

जाय) तो राजाको उसका पाप नहीं लगता ।। २१ ।।

विच्छिद्यन्ते समारब्धा सिद्ध्यन्ते चापि दैवतः ।

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व · पृष्ठ 157, कुल 2450 में से · BharatKosha