भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 158

कृते पुरुषकारे तु नैनः स्पृशति पार्थिवम् ॥ २२ ॥ ‘आरम्भ किये हुए कार्य दैवकी प्रतिकूलतासे नष्ट हो जाते हैं और उसके अनुकूल होनेपर सिद्ध भी हो जाते हैं; परंतु अपनी ओरसे (यथोचित) पुरुषार्थ कर देनेपर (यदि कार्यकी सिद्धि नहीं भी हुई तो) राजाको पापका स्पर्श नहीं प्राप्त होता है ॥ २२ ॥

अत्र ते राजशार्दूल वर्तयिष्ये कथामिमाम् । यद् वृत्तं पूर्वराजर्षेर्हयग्रीवस्य पाण्डव ॥ २३ ॥ ‘राजसिंह पाण्डुकुमार! इस विषयमें मैं तुम्हें एक कथा सुना रहा हूँ, जो पूर्वकालवर्ती राजर्षि हयग्रीवके जीवनका वृत्तान्त है ॥ २३ ॥

शत्रून् हत्वा हतस्याजौ शूरस्याक्लिष्टकर्मणः । असहायस्य संग्रामे निर्जितस्य युधिष्ठिर ॥ २४ ॥ ‘हयग्रीव बड़े शूरवीर और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले थे। युधिष्ठिर! उन्होंने युद्धमें शत्रुओंको मार गिराया था; परंतु पीछे असहाय हो जानेपर वे संग्राममें परास्त हुए और शत्रुओंके हाथसे मारे गये ॥ २४ ॥

यत् कर्म वै निग्रहे शात्रवाणां योगश्चाग्र्यः पालने मानवानाम् । कृत्वा कर्म प्राप्य कीर्तिं स युद्धाद् वाजिग्रीवो मोदते स्वर्गलोके ॥ २५ ॥ ‘उन्होंने शत्रुओंको परास्त करनेमें जो पराक्रम दिखाया था, मानवीय प्रजाके पालनमें जिस श्रेष्ठ उद्योग एवं एकाग्रताका परिचय दिया था, वह अद्भुत था। उन्होंने पुरुषार्थ करके युद्धसे उत्तम कीर्ति पायी और इस समय वे राजा हयग्रीव स्वर्गलोकमें आनन्द भोग रहे हैं ॥ २५ ॥

संयुक्तात्मा समरेष्वाततायी शस्त्रैश्छिन्नो दस्युभिर्वध्यमानः । अश्वग्रीवः कर्मशीलो महात्मा संसिद्धार्थो मोदते स्वर्गलोके ॥ २६ ॥ ‘वे अपने मनको वशमें करके समरांगणमें हथियार लेकर शत्रुओंका वध कर रहे थे; परंतु डाकुओंने उन्हें अस्त्र-शस्त्रोंसे छिन्न-भिन्न करके मार डाला। इस समय कर्मपरायण महामनस्वी हयग्रीव पूर्णमनोरथ होकर स्वर्गलोकमें आनन्द कर रहे हैं ॥ २६ ॥

धनुर्यूपो रशना ज्या शरः स्रुक् स्रुवः खड्गो रुधिरं यत्र चाज्यम् । रथो वेदी कामगो युद्धमग्नि- श्चातुर्होत्रं चतुरो वाजिमुख्याः ॥ २७ ॥ हुत्वा तस्मिन् यज्ञवह्नावथारीन्