महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1562, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह प्रजापतिके समान क्षोभरहित होकर अपने शरीरसे प्रजाकी सृष्टि कर सकता है। जिसको वायुतत्त्व सिद्ध हो जाता है, वह बिना किसीकी सहायताके हाथ-पैर, अँगूठे अथवा अंगुलिमात्रसे दबाकर पृथ्वीको कम्पित कर सकता है—ऐसा सुननेमें आया है ।। २३ १/२ ।।
आकाशभूतश्चाकाशे सवर्णत्वात् प्रकाशते ।। २४ ।।
वर्णतो गृह्यते चापि कामात् पिबति चाशयान् ।
आकाशको सिद्ध करनेवाला पुरुष आकाशमें आकाशके ही समान सर्वव्यापी हो जाता है। वह अपने शरीरको अन्तर्धान करनेकी शक्ति प्राप्त कर लेता है। जिसका जलतत्त्वपर अधिकार होता है, वह इच्छा करते ही बड़े-बड़े जलाशयोंको पी जाता है ।। २४ १/२ ।।
न चास्य तेजसा रूपं दृश्यते शाम्यते तथा ।
अहङ्कारेऽस्य विजिते पञ्चैते स्युर्वशानुगाः ।। २५ ।।
अग्नितत्त्वको सिद्ध कर लेनेपर वह अपने शरीरको इतना तेजस्वी बना लेता है कि कोई उसकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता और न उसके तेजको बुझा ही सकता है। अहंकारको जीत लेनेपर पाँचों भूत योगीके वशमें हो जाते हैं ।। २५ ।।
षण्णामात्मनि बुद्धौ च जितायां प्रभवत्यथ ।
निर्दोषप्रतिभा ह्येनं कृत्स्ना समभिवर्तते ।। २६ ।।
पञ्चभूत और अहंकार—इन छः तत्त्वोंका आत्मा है बुद्धि। उसको जीत लेनेपर सम्पूर्ण ऐश्वर्योंकी प्राप्ति हो जाती है तथा उस योगीको निर्दोष प्रतिभा (विशुद्ध तत्त्वज्ञान) पूर्ण रूपसे प्राप्त हो जाती है ।। २६ ।।
तथैव व्यक्तमात्मानमव्यक्तं प्रतिपद्यते ।
यतो निःसरते लोको भवति व्यक्तसंज्ञकः ।। २७ ।।
उपर्युक्त सप्त पदार्थोंका कार्यभूत व्यक्त जगत् अव्यक्त परमात्मामें ही विलीन हो जाता है, क्योंकि उन्हीं परमात्मासे यह जगत् उत्पन्न होता है और व्यक्त नाम धारण करता है ।। २७ ।।
तत्राव्यक्तमयीं विद्यां शृणु त्वं विस्तरेण मे ।
तथा व्यक्तमयं चैव सांख्ये पूर्वं निबोध मे ।। २८ ।।
वत्स! तुम सांख्यदर्शनमें वर्णित अव्यक्तविद्याका विस्तारपूर्वक मुझसे श्रवण करो। सर्वप्रथम सांख्यशास्त्रमें कथित व्यक्तविद्याको मुझसे समझो ।। २८ ।।
पञ्चविंशति तत्त्वानि तुल्यान्युभयतः समम् ।
योगे सांख्येऽपि च तथा विशेषं तत्र मे शृणु ।। २९ ।।