महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1563, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसांख्य और पातञ्जलयोग—इन दोनों दर्शनोंमें समानभावसे पचीस तत्त्वोंका प्रतिपादन किया गया है*। इस विषयमें जो विशेष बात है, वह मुझसे सुनो ॥ २९ ॥ प्रोक्तं तद् व्यक्तमित्येव जायते वर्धते च यत् । जीर्यते म्रियते चैव चतुर्भिर्लक्षणैर्युतम् ॥ ३० ॥ जन्म, वृद्धि, जरा और मरण—इन चार लक्षणोंसे युक्त जो तत्त्व है, उसीको व्यक्त कहते हैं ॥ ३० ॥ विपरीतमतो यत् तु तदव्यक्तमुदाहृतम् । द्वावात्मानौ च वेदेषु सिद्धान्तेष्वप्युदाहृतौ ॥ ३१ ॥ जो तत्त्व इसके विपरीत हैं अर्थात् जिसमें जन्म आदि चारों विकार नहीं हैं, उसे अव्यक्त कहा गया है। वेदों और सिद्धान्तप्रतिपादक शास्त्रोंमें उस अव्यक्तके दो भेद बताये गये हैं—जीवात्मा और परमात्मा ॥ ३१ ॥ चतुर्लक्षणजं त्वाद्यं चतुर्वर्गं प्रचक्षते । व्यक्तमव्यक्तजं चैव तथा बुद्धमथेतरत् । सत्त्वं क्षेत्रज्ञ इत्येतद् द्वयमप्यनुदर्शितम् ॥ ३२ ॥ द्वावात्मानौ च वेदेषु विषयेष्वनुरज्यतः । विषयात् प्रतिसंहारः सांख्यानां सिद्धि लक्षणम् ॥ ३३ ॥ अव्यक्त होते हुए भी जीवात्मा व्यक्तके सम्पर्कसे जन्म, वृद्धि, जरा और मृत्यु—इन चार लक्षणोंसे युक्त तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चार पुरुषार्थोंसे सम्बन्धित कहा जाता है। दूसरा अव्यक्त परमात्मा ज्ञानस्वरूप है। व्यक्त (जडवर्ग) की उत्पत्ति उसी अव्यक्त (परमात्मा) से होती है। व्यक्तको सत्त्व (जडवर्ग—क्षेत्र) तथा अव्यक्त जीवात्माको क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। इस प्रकार इन दोनोंहीका वर्णन किया गया है। वेदोंमें भी पूर्वोक्त दो आत्मा बताये गये हैं। विषयोंमें आसक्त हुआ जीवात्मा जब आसक्तिरहित होकर विषयोंसे निवृत्त हो जाता है, तब वह मुक्त कहलाता है। सांख्यवादियोंके मतमें यही मोक्षका लक्षण है ॥ ३२-३३ ॥ निर्ममश्चानहङ्कारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः । नैव क्रुद्ध्यति न द्वेष्टि नानृता भाषते गिरः ॥ ३४ ॥ आक्रुष्टस्ताडितश्चैव मैत्रेण ध्याति नाशुभम् । वाग्दण्डकर्ममनसां त्रयाणां च निवर्तकः ॥ ३५ ॥ समः सर्वेषु भूतेषु ब्रह्माणमभिवर्तते ।