महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'एक मानता है कि आत्मा मारता है।' दूसरा ऐसा मानता है कि 'नहीं मारता है।' पाञ्चभौतिक शरीरोंके जन्म और मरण स्वभावतः नियत हैं ।। १६ ।।
नष्टे धने वा दारे वा पुत्रे पितरि वा मृते ।
अहो दुःखमिति ध्यायन् दुःखस्यापचितिं चरेत् ।। १७ ।।
'धनके नष्ट होनेपर अथवा स्त्री, पुत्र या पिताकी मृत्यु होनेपर मनुष्य 'हाय! मुझपर बड़ा भारी दुःख आ पड़ा' इस प्रकार चिन्ता करते हुए उस दुःखकी निवृत्तिकी चेष्टा करता है ।। १७ ।।
स किं शोचसि मूढः सन् शोच्यान् किमनुशोचसि ।
पश्य दुःखेषु दुःखानि भयेषु च भयान्यपि ।। १८ ।।
'तुम मूढ़ बनकर शोक क्यों कर रहे हो? उन मरे हुए शोचनीय व्यक्तियोंका बारंबार स्मरण ही क्यों करते हो? देखो, शोक करनेसे दुःखमें दुःख तथा भयमें भयकी वृद्धि होगी ।। १८ ।।
आत्मापि चायं न मम सर्वापि पृथिवी मम ।
यथा मम तथान्येषामिति पश्यन् न मुह्यति ।। १९ ।।
'यह शरीर भी अपना नहीं है और सारी पृथ्वी भी अपनी नहीं है। यह जिस तरहसे मेरी है, उसी तरह दूसरोंकी भी है। ऐसी दृष्टि रखनेवाला पुरुष कभी मोहमें नहीं फँसता है ।। १९ ।।
शोकस्थानसहस्राणि हर्षस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ।। २० ।।
'शोकके सहस्रों स्थान हैं, हर्षके भी सैकड़ों अवसर हैं। वे प्रतिदिन मूढ़ मनुष्यपर ही प्रभाव डालते हैं, विद्वान्पर नहीं ।। २० ।।
एवमेतानि कालेन प्रियद्वेष्याणि भागशः ।
जीवेषु परिवर्तन्ते दुःखानि च सुखानि च ।। २१ ।।
इस प्रकार ये प्रिय और अप्रिय भाव ही दुःख और सुख बनकर अलग-अलग सभी जीवोंको प्राप्त होते रहते हैं ।। २१ ।।
दुःखमेवास्ति न सुखं तस्मात् तदुपलभ्यते ।
तृष्णार्तिप्रभवं दुःखं दुःखार्तिप्रभवं सुखम् ।। २२ ।।
'संसारमें केवल दुःख ही है, सुख नहीं, अतः दुःख ही उपलब्ध होता है। तृष्णाजनित पीड़ासे दुःख और दुःखकी पीड़ासे सुख होता है अर्थात् दुःखसे आर्त हुए मनुष्यको ही उसके न रहनेपर सुखकी प्रतीति होती है ।। २२ ।।
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।
न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ।। २३ ।।