भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 165

'सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता है। कोई भी न तो सदा दुःख पाता है और न निरन्तर सुख ही प्राप्त करता है ॥ २३ ॥
सुखमेव हि दुःखान्तं कदाचिद् दुःखतः सुखम् ।
तस्मादेतद् द्वयं जह्याद् य इच्छेच्छाश्वतं सुखम् ॥ २४ ॥
सुखान्तप्रभवं दुःखं दुःखान्तप्रभवं सुखम् ।
'कभी दुःखके अन्तमें सुख और कभी सुखके अन्तमें दुःख भी आता है; अतः जो नित्य सुखकी इच्छा रखता हो, वह इन दोनोंका परित्याग कर दे; क्योंकि दुःख सुखके अन्तमें अवश्यम्भावी है, वैसे ही सुख भी दुःखके अन्तमें अवश्यम्भावी है ॥ २४ १/२ ॥
यन्निमित्तो भवेच्छोकस्तापो वा भृशदारुणः ॥ २५ ॥
आयासो वापि यन्मूलस्तदेकाङ्गमपि त्यजेत् ।
'जिसके कारण शोक और बढ़ा हुआ ताप होता हो अथवा जो आयासका भी मूल कारण हो, वह अपने शरीरका एक अंग भी हो तो भी उसको त्याग देना चाहिये ॥
सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाप्रियम् ।
प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥ २६ ॥
'सुख हो या दुःख, प्रिय हो अथवा अप्रिय, जब जो कुछ प्राप्त हो, उस समय उसे सहर्ष अपनावे। अपने हृदयसे उसके सामने पराजय न स्वीकार करे (हिम्मत न हारे) ॥ २६ ॥
ईषदप्यङ्ग दाराणां पुत्राणां वा चराप्रियम् ।
ततो ज्ञास्यसि कः कस्य केन वा कथमेव च ॥ २७ ॥
'प्रिय मित्र! स्त्री अथवा पुत्रोंका थोड़ा-सा भी अप्रिय कर दो, फिर स्वयं समझ जाओगे कि कौन किस हेतुसे किस तरह किसके साथ कितना सम्बन्ध रखता है? ॥
ये च मूढतमा लोके ये च बुद्धेः परं गताः ।
त एव सुखमेधन्ते मध्यमः क्लिश्यते जनः ॥ २८ ॥
'संसारमें जो अत्यन्त मूर्ख हैं, अथवा जो बुद्धिसे परे पहुँच गये हैं, वे ही सुखी होते हैं; बीचवाले लोग कष्ट ही उठाते हैं' ॥ २८ ॥
इत्यब्रवीन्महाप्राज्ञो युधिष्ठिर स सेनजित् ।
परावरज्ञो लोकस्य धर्मवित् सुखदुःखवित् ॥ २९ ॥
युधिष्ठिर! लोकके भूत और भविष्य तथा सुख एवं दुःखको जाननेवाले धर्मवेत्ता महाज्ञानी सेनजित्‌ने ऐसा ही कहा है ॥ २९ ॥
येन दुःखेन यो दुःखी न स जातु सुखी भवेत् ।
दुःखानां हि क्षयो नास्ति जायते ह्यपरात् परम् ॥ ३० ॥
जिस किसी भी दुःखसे जो दुखी है, वह कभी सुखी नहीं हो सकता; क्योंकि दुःखोंका अन्त नहीं है। एक दुःखसे दूसरा दुःख होता ही रहता है ॥ ३० ॥
सुखं च दुःखं च भवाभवौ च