महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1648, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
पञ्चभूतोंके तथा मन और बुद्धिके गुणोंका विस्तृत वर्णन
भीष्म उवाच
भूतानां परिसंख्यानं भूयः पुत्र निशामय ।
द्वैपायनमुखाद् भ्रष्टं श्लाघया परयानघ ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—निष्पाप पुत्र युधिष्ठिर! द्वैपायन व्यासजीके मुखसे वर्णित जो पञ्चमहाभूतोंका निरूपण है, वह मैं पुनः तुम्हें बता रहा हूँ; तुम बड़ी स्पृहाके साथ इस विषयको सुनो ॥ १ ॥
दीप्तानलनिभः प्राह भगवान् धूमवर्चसे ।
ततोऽहमपि वक्ष्यामि भूयः पुत्र निदर्शनम् ॥ २ ॥
वत्स! प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी भगवान् वेदव्यासने धूमाच्छादित अग्निके सदृश विराजमान अपने पुत्र शुकदेवके समक्ष पहले जिस प्रकार इस विषयका प्रतिपादन किया था, उसे मैं पुनः तुमसे कहूँगा। बेटा! तुम सुनिश्चित दर्शन-शास्त्रको श्रवण करो ॥ २ ॥
भूमेः स्थैर्यं गुरुत्वं च काठिन्यं प्रसवार्थता ।
गन्धो गुरुत्वं शक्तिश्च संघातः स्थापना धृतिः ॥ ३ ॥
स्थिरता, भारीपन, कठिनता (कड़ापन), बीजको अंकुरित करनेकी शक्ति, गन्ध, विशालता, शक्ति, संघात, स्थापना और धारणशक्ति—ये दस पृथ्वीके गुण हैं ॥ ३ ॥
अपां शैत्यं रसः क्लेदो द्रवत्वं स्नेहसौम्यता ।
जिह्वा विस्यन्दनं चापि भौमानां श्रपणं तथा ॥ ४ ॥
शीतलता, रस, क्लेद (गलाना या गीला करना), द्रवत्व (पिघलना), स्नेह (चिकनाहट), सौम्यभाव, जिह्वा, टपकना, ओले या बर्फके रूपमें जम जाना तथा पृथ्वीसे उत्पन्न होनेवाले चावल-दाल आदिको गला देना—ये सब जलके गुण हैं ॥ ४ ॥
अग्नेर्दुर्धर्षता ज्योतिस्तापः पाकः प्रकाशनम् ।
शोको रागो लघुस्तैक्ष्ण्यं सततं चोर्ध्वभासिता ॥ ५ ॥
दुर्धर्ष होना, जलना, ताप देना, पकाना, प्रकाश करना, शोक, राग, हलकापन, तीक्ष्णता और आगकी लपटोंका सदा ऊपरकी ओर उठना एवं प्रकाशित होना—ये सब अग्निके गुण हैं ॥ ५ ॥
वायोरनियमस्पर्शो वादस्थानं स्वतन्त्रता ।