भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1649, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1649

बलं शैघ्र्यं च मोक्षं च कर्म चेष्टाऽऽत्मता भवः ॥ ६ ॥ अनियत स्पर्श, वाक्-इन्द्रियकी स्थिति, चलने-फिरने आदिकी स्वतन्त्रता, बल, शीघ्रगामिता, मल-मूत्र आदिको शरीरसे बाहर निकालना, उत्क्षेपण आदि कर्म, क्रिया-शक्ति, प्राण और जन्म-मृत्यु—ये सब वायुके गुण हैं ॥ ६ ॥ आकाशस्य गुणः शब्दो व्यापित्वं छिद्रतापि च । अनाश्रयमनलम्बमव्यक्तमविकारिता ॥ ७ ॥ अप्रतीघातिता चैव भूतत्वं विकृतानि च । गुणाः पञ्चाशतं प्रोक्ताः पञ्चभूतात्मभाविताः ॥ ८ ॥ शब्द, व्यापकता, छिद्र होना, किसी स्थूल पदार्थका आश्रय न होना, स्वयं किसी दूसरे आधारपर न रहना, अव्यक्तता, निर्विकारता, प्रतिघातशून्यता और भूतता अर्थात् श्रवणेन्द्रियका कारण होना और विकृतिसे युक्त होना—से सब आकाशके गुण हैं। इस प्रकार पञ्चमहाभूतोंके ये पचास गुण बताये गये हैं ॥ ७-८ ॥ धैर्योपपत्तिर्व्यक्तिश्च विसर्गः कल्पना क्षमा । सदसच्चाशुता चैव मनसो नव वै गुणाः ॥ ९ ॥ धैर्य, तर्क-वितर्कमें कुशलता, स्मरण, भ्रान्ति, कल्पना, क्षमा, शुभ एवं अशुभ संकल्प और चंचलता—ये मनके नौ गुण हैं ॥ ९ ॥ इष्टानिष्टविपत्तिश्च व्यवसायः समाधिता । संशयः प्रतिपत्तिश्च बुद्धेः पञ्चगुणान् विदुः ॥ १० ॥ इष्ट और अनिष्ट वृत्तियोंका नाश, विचार, समाधान, संदेह और निश्चय—ये पाँच बुद्धिके गुण माने गये हैं ॥ १० ॥

युधिष्ठिर उवाच

कथं पञ्चगुणा बुद्धिः कथं पञ्चेन्द्रिया गुणाः । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व सूक्ष्मज्ञानं पितामह ॥ ११ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! बुद्धिके पाँच ही गुण कैसे हैं? तथा पाँच इन्द्रियाँ भी भूतोंके गुण कैसे हो सकती हैं? यह सारा सूक्ष्म ज्ञान आप मुझे बताइये ॥ ११ ॥

भीष्म उवाच

आहुः षष्टिं बुद्धिगुणान् वै भूतविशिष्टा नित्यविषक्ताः । भूतविभूतीश्चाक्षरसृष्टाः पुत्र न नित्यं तदिह वदन्ति ॥ १२ ॥ भीष्मजीने कहा—वत्स युधिष्ठिर! महर्षियोंका कहना है कि बुद्धिके साठ गुण हैं; अर्थात् पाँचों भूतोंके पूर्वोक्त पचास गुण तथा बुद्धिके पाँच गुण मिलकर पचपन हुए। इनमें