भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1651

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षट्पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका मृत्युविषयक प्रश्न, नारदजीका राजा अकम्पनसे मृत्युकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाते हुए ब्रह्माजीकी रोषाग्निसे प्रजाके दग्ध होनेका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

य इमे पृथिवीपालाः शेरते पृथिवीतले ।
पृतनामध्य एते हि गतसंज्ञा महाबलाः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! ये जो असंख्य भूपाल (प्राणशून्य होकर) इस भूतलपर सेनाके बीचमें सो रहे हैं इनकी ओर दृष्टिपात कीजिये। ये महान् बलवान् थे तो भी संज्ञाहीन होकर पड़े हैं ॥ १ ॥

एकैकशो भीमबला नागायुतबलास्तथा ।
एते हि निहताः संख्ये तुल्यतेजोबलैर्नरैः ॥ २ ॥
इनमेंसे एक-एक नरेश भयानक बलसे सम्पन्न था। दस-दस हजार हाथियोंकी शक्ति रखता था। वे सब-के-सब इस युद्धस्थलमें अपने समान ही तेजस्वी और बलवान् मनुष्योंद्वारा मारे गये हैं ॥ २ ॥

नैषां पश्यामि हन्तारं प्राणिनां संयुगे परम् ।
विक्रमेणोपसम्पन्नास्तेजोबलसमन्विताः ॥ ३ ॥
इन प्राणशक्ति-सम्पन्न नरेशोंको कोई दूसरा वीर संग्रामभूमिमें मार सके—ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता था; क्योंकि वे सब-के-सब बल-पराक्रमसे सम्पन्न और तेजस्वी थे ॥ ३ ॥

अथ चेमे महाप्राज्ञाः शेरते हि गतासवः ।
मृता इति च शब्दोऽयं वर्तत्येषु गतासुषु ॥ ४ ॥
किंतु इस समय ये महाबुद्धिमान् भूपाल निष्प्राण होकर पड़े हैं। इनके प्राण निकल जानेपर इनके लिये मृत शब्दका व्यवहार होता है; अर्थात् ‘ये मर गये’ ऐसा कहा जाता है ॥ ४ ॥

इमे मृता नृपतयः प्रायशो भीमविक्रमाः ।
तत्र मे संशयो जातः कुतः संज्ञा मृता इति ॥ ५ ॥

कस्य मृत्युः कुतो मृत्युः केन मृत्युरिह प्रजाः ।
हरत्यमरसंकाश तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ६ ॥