भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1652

ये जो नरेश मृत्युको प्राप्त हो गये हैं, इनमें बहुत-से भयानक पराक्रमसे सम्पन्न हैं। यहाँ मेरे मनमें यह संदेह होता है कि इन्हें मृत नाम कैसे दिया गया? किसकी मृत्यु होती है? किससे मृत्यु होती है? और किस कारणसे मृत्यु यहाँ समस्त प्राणियोंका अपहरण करती है? देवतुल्य पितामह! मुझे यह सब बतानेकी कृपा करें॥ ५-६॥

भीष्म उवाच

पुरा कृतयुगे तात राजा ह्यासीदकम्पनः।
स शत्रुवशमापन्नः संग्रामे क्षीणवाहनः॥ ७॥
**भीष्मजीने कहा—**तात! प्राचीन सत्ययुगकी बात है, अकम्पन नामके एक राजा थे। एक समय संग्राममें उनका रथ नष्ट हो गया और वे शत्रुके वशमें पड़ गये॥ ७॥

तस्य पुत्रो हरिर्नाम नारायणसमो बले।
स शत्रुभिर्हतः संख्ये सबलः सपदानुगः॥ ८॥
उनके एक पुत्र था, जिसका नाम था हरि। वह बलमें भगवान् नारायणके ही समान जान पड़ता था, परंतु उस समराङ्गणमें शत्रुओंने सेना और सेवकोंसहित उस राजकुमारको मार गिराया॥ ८॥

स राजा शत्रुवशगः पुत्रशोकसमन्वितः।
यदृच्छया शान्तिपरो ददर्श भुवि नारदम्॥ ९॥
राजा अकम्पन स्वतन्त्र भूपाल न रहकर शत्रुके अधीन हो गये तथा पुत्रके शोकमें डूबे रहने लगे। वे शान्तिका उपाय ढूँढ़ रहे थे। इतनेहीमें दैवेच्छासे भूतलपर विचरते हुए देवर्षि नारदका उन्हें दर्शन हुआ॥ ९॥

तस्मै स सर्वमाचष्ट यथावृत्तं जनेश्वरः।
शत्रुभिर्ग्रहणं संख्ये पुत्रस्य मरणं तथा॥ १०॥
राजाने युद्धस्थलमें शत्रुओंद्वारा अपने पकड़े जाने एवं पुत्रकी मृत्यु होनेका सारा समाचार यथावत् रूपसे नारदजीके सामने कह सुनाया॥ १०॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा नारदोऽथ तपोधनः।
आख्यानमिदमाचष्ट पुत्रशोकापहं तदा॥ ११॥
राजाका वह कथन सुनकर तपस्याके धनी नारदजीने उस समय उनसे यह प्राचीन इतिहास कहना आरम्भ किया, जो उनके पुत्रशोकको मिटानेवाला था॥ ११॥

नारद उवाच

राजन् शृणु समाख्यानमद्येदं बहुविस्तरम्।
यथावृत्तं श्रुतं चैव मयेदं वसुधाधिप॥ १२॥
**नारदजी बोले—**राजन्! आज यह अत्यन्त विस्तृत आख्यान सुनो। पृथ्वीनाथ! मैंने इसे जैसा सुना है, वह यथावत् वृत्तान्त तुम्हें सुना रहा हूँ॥ १२॥