महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1653, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रजाः सृष्ट्वा महातेजाः प्रजासर्गे पितामहः । अतीव वृद्धा बहुला नामृष्यत पुनः प्रजाः ॥ १३ ॥ प्रजाकी सृष्टि करते समय महातेजस्वी पितामह ब्रह्माने जब बहुत-से प्राणियोंकी सृष्टि कर डाली, तब उनकी संख्या बहुत अधिक हो गयी। इतनी अधिक प्रजाओंका होना ब्रह्माजीसे सहन न हो सका ॥ १३ ॥
न ह्यन्तरमभूत् किञ्चित् क्वचिज्जन्तुभिरच्युत । निरुच्छ्वासमिवोन्नद्धं त्रैलोक्यमभवन्नृप ॥ १४ ॥ अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले नरेश! उस समय कहीं कोई थोड़ा-सा भी ऐसा स्थान नहीं रह गया, जो जीव-जन्तुओंसे भरा न हो। सारी त्रिलोकी अवरुद्ध हो गयी। लोगोंका कहीं साँस लेना भी असम्भव-सा हो गया—सबका दम घुटने लगा ॥ १४ ॥
तस्य चिन्ता समुत्पन्ना संहारं प्रति भूपते । चिन्तयन् नाध्यगच्छच्च संहारे हेतुकारणम् ॥ १५ ॥ भूपाल! अब ब्रह्माजीके मनमें प्रजाके संहारकी—उनकी संख्या घटानेकी चिन्ता उत्पन्न हुई। वे बहुत देरतक सोचते-विचारते रहे, परंतु प्रजाके संहारका कोई युक्तियुक्त कारण ध्यानमें नहीं आया ॥ १५ ॥
तस्य रोषान्महाराज खेभ्योऽग्निरुदतिष्ठत । तेन सर्वा दिशो राजन् ददाह स पितामहः ॥ १६ ॥ महाराज! उस समय रोषवश ब्रह्माजीके नेत्र आदि इन्द्रियगोलकोंसे अग्नि प्रकट हो गयी। राजन्! उस अग्निसे पितामहने सम्पूर्ण दिशाओंको दग्ध करना आरम्भ किया ॥ १६ ॥
ततो दिवं भुवं खं च जगच्च सचराचरम् । ददाह पावको राजन् भगवत्कोपसम्भवः ॥ १७ ॥ राजन्! तब भगवान् ब्रह्माके क्रोधसे प्रकट हुई वह आग स्वर्ग, पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण जगत्को जलाने लगी ॥ १७ ॥
तत्रादह्यन्त भूतानि जङ्गमानि ध्रुवाणि च । महता क्रोधवेगेन कुपिते प्रपितामहे ॥ १८ ॥ प्रपितामह ब्रह्माके कुपित होनेपर उनके क्रोधके महान् वेगसे सभी स्थावर-जङ्गम प्राणी दग्ध होने लगे ॥ १८ ॥
ततोऽध्वरजटः स्थाणुर्वेदाध्वरपतिः शिवः । जगाम शरणं देवो ब्रह्माणं परवीरहा ॥ १९ ॥ तब यज्ञ ही जिनकी जटाएँ हैं तथा जो वेदों और यज्ञोंके प्रतिपालक हैं, वे शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कल्याणकारी भगवान् शिव ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ १९ ॥
तस्मिन्नभिगते स्थाणौ प्रजानां हितकाम्यया ।