महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1696, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्राचीन कालके ब्राह्मण सत्यभाषण और इन्द्रिय-संयमरूप यज्ञका अनुष्ठान करते थे। वे परम पुरुषार्थ (मोक्ष)के प्रति लोभ रखते थे, उन्हें लौकिक धनकी प्यास नहीं रहती थी, वे उस ओरसे सदा तृप्त रहते थे। वे सब लोग प्राप्त वस्तुका त्याग करनेवाले और ईर्ष्या-द्वेषसे रहित थे ।। १८ १/२ ।।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञतत्त्वज्ञाः स्वयज्ञपरिनिष्ठिताः ।। १९ ।।
ब्राह्मं वेदमधीयन्तस्तोषयन्त्यपरानपि ।
वे क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के तत्त्वको जाननेवाले और आत्मयज्ञ-परायण थे। उपनिषदोंके अध्ययनमें तत्पर रहते तथा स्वयं संतुष्ट होकर दूसरोंको भी संतोष देते थे ।। १९ १/२ ।।
अखिलं दैवतं सर्वं ब्रह्म ब्रह्मणि संश्रितम् ।। २० ।।
तुष्यन्ति तृप्यतो देवास्तृप्तास्तृप्तस्य जाजले ।
ब्रह्म सर्वस्वरूप है, सम्पूर्ण देवता उसीके रूप हैं, वह ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणके भीतर विराजमान है। इसलिये जाजले! इसके तृप्त होनेपर सम्पूर्ण देवता तृप्त एवं संतुष्ट हो जाते हैं ।। २० १/२ ।।
यथा सर्वरसैस्तृप्तो नाभिनन्दति किंचन ।। २१ ।।
तथा प्रज्ञानतृप्तस्य नित्यतृप्तिः सुखोदया ।
जैसे सब प्रकारके रसोंसे तृप्त हुआ मनुष्य किसी भी रसका अभिनन्दन नहीं करता, उसी प्रकार जो ज्ञानानन्दसे परितृप्त है, उसे अक्षय सुख देनेवाली नित्य तृप्ति बनी रहती है ।। २१ १/२ ।।
धर्माधारा धर्मसुखाः कृत्स्नाव्यवसितास्तथा ।। २२ ।।
अस्ति नस्तत्त्वतो भूय इति प्राज्ञस्त्ववेक्षते ।
हममेंसे बहुत लोग ऐसे हैं, जिनका धर्म ही आधार है, जो धर्ममें ही सुख मानते हैं तथा जिन्होंने सम्पूर्ण कर्तव्य-अकर्तव्यका निश्चय कर लिया है; परंतु हमलोगोंका जो यथार्थरूप है, उसकी अपेक्षा बहुत महान् और व्यापक परमात्मा सर्वत्र सर्वात्मा रूपसे विराजमान है—ऐसा ज्ञानी पुरुष देखता है ।। २२ १/२ ।।
ज्ञानविज्ञानिनः केचित् परं पारं तितीर्षवः ।। २३ ।।
अतीव पुण्यदं पुण्यं पुण्याभिजनसंहितम् ।
यत्र गत्वा न शोचन्ति न च्यवन्ति व्यथन्ति च ।। २४ ।।
भवसागरसे पार उतरनेकी इच्छावाले कोई-कोई ज्ञान-विज्ञानसम्पन्न महात्मा पुरुष ही अत्यन्त पवित्र और पुण्यात्माओंसे सेवित पुण्यदायक ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं, जहाँ जाकर वे न तो शोक करते हैं, न वहाँसे नीचे गिरते हैं और न मनमें किसी प्रकारकी व्यथाका ही अनुभव करते हैं ।। २३-२४ ।।