महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1697, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंते तु तद् ब्रह्मणः स्थानं प्राप्नुवन्तीह सात्त्विकाः । नैव ते स्वर्गमिच्छन्ति न यजन्ति यशोधनैः ॥ २५ ॥ सतां वर्त्मानुवर्तन्ते यजन्ते चाविहिंसया । वनस्पतीनौषधीश्च फलं मूलं च ते विदुः ॥ २६ ॥ न चैतानृत्विजो लुब्धा याजयन्ति फलार्थिनः । वे सात्त्विक महापुरुष उस ब्रह्मधामको ही प्राप्त होते हैं, उन्हें स्वर्गकी इच्छा नहीं होती, वे यश और धनके लिये यज्ञ नहीं करते, सत्पुरुषोंके मार्गपर चलते और हिंसारहित यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं। वनस्पति, अन्न और फल-मूलको ही वे हविष्य मानते हैं, धनकी इच्छा रखनेवाले लोभी ऋत्विज् इनका यज्ञ नहीं कराते हैं॥ २५-२६½॥ स्वमेव चार्थं कुर्वाणा यज्ञं चक्रुः पुनर्द्विजाः ॥ २७ ॥ परिनिष्ठितकर्माणः प्रजानुग्रहकाम्यया । ज्ञानी ब्राह्मणोंने अपनेको ही यज्ञका उपकरण मानकर मानसिक यज्ञका अनुष्ठान किया है। उन्होंने प्रजाहितकी कामनासे ही मानसिक यज्ञका अनुष्ठान किया है॥ २७½॥ तस्मात् तानृत्विजो लुब्धा याजयन्त्यशुभान् नरान् ॥ २८ ॥ प्रापयेयुः प्रजाः स्वर्गे स्वधर्माचरणेन वै । इति मे वर्तते बुद्धिः समा सर्वत्र जाजले ॥ २९ ॥ लोभी ऋत्विज् तो ऐसे लोगोंका ही यज्ञ कराते हैं, जो अशुभ (मोक्षकी इच्छासे रहित) होते हैं, श्रेष्ठ पुरुष तो स्वधर्मका आचरण करते हुए ही प्रजाको स्वर्गमें पहुँचा देते हैं। जाजले! यही सोचकर मेरी बुद्धि भी सर्वत्र समान भाव ही रखती है॥ २८-२९॥ यानि यज्ञेष्विहेज्यन्ति सदा प्राज्ञा द्विजर्षभाः । तेन ते देवयानेन पथा यान्ति महामुने ॥ ३० ॥ महामुने! श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मण सदा ही जिन द्रव्योंको लेकर उनका यज्ञोंमें उपयोग करते हैं, उन्हींके द्वारा वे दिव्य मार्गसे पुण्य लोकोंमें जाते हैं॥ ३० ॥ आवृत्तिस्तस्य चैकस्य नास्त्यावृत्तिर्मनीषिणः । उभौ तौ देवयानेन गच्छतो जाजले यथा ॥ ३१ ॥ जाजले! जो कामनाओंमें आसक्त है, उसी मनुष्यकी इस संसारमें पुनरावृत्ति होती है। ज्ञानीका पुनः यहाँ जन्म नहीं होता। यद्यपि दोनों दिव्यमार्गसे ही पुण्यलोकोंमें जाते हैं, तथापि संकल्प-भेदसे ही उनकी आवृत्ति और अनावृत्ति होती है॥ ३१ ॥ स्वयं चैषामनडुहो युज्यन्ति च वहन्ति च । स्वयमुस्राश्च दुह्यन्ते मनःसंकल्पसिद्धिभिः ॥ ३२ ॥ ज्ञानी महात्माओंकी इच्छा होते ही उनके मानसिक संकल्पकी सिद्धियोंके अनुसार बैल स्वयं गाड़ीमें जुतकर उनकी सवारी ढोने लगते हैं, दूध देनेवाली गौएँ स्वयं ही सब प्रकारके मनोरथोंकी सिद्धिरूप दुग्ध प्रदान करती हैं॥ ३२ ॥