भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1714, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1714

है॥ ४१ ॥ एवं नारीं मातरं च गौरवे चाधिके स्थिताम् । अवध्यां तु विजानीयुः पशवोऽप्यविचक्षणाः ॥ ४२ ॥ 'इस प्रकार विचार करनेसे एक तो वह नारी होनेके कारण ही अवध्य है, दूसरे मेरी पूजनीया माता है। माताका गौरव पितासे भी बढ़कर है, जिसमें मेरी माँ प्रतिष्ठित है। नासमझ पशु भी स्त्री और माताको अवध्य मानते हैं (फिर मैं समझदार मनुष्य होकर भी उसका वध कैसे करूँ?) ॥

देवतानां समावायमेकस्थं पितरं विदुः । मर्त्यानां देवतानां च स्नेहादभ्येति मातरम् ॥ ४३ ॥ 'मनीषी पुरुष यह जानते हैं कि पिता एक स्थानपर स्थित सम्पूर्ण देवताओंका समूह है; परंतु माताके भीतर उसके स्नेहवश समस्त मनुष्यों और देवताओंका समुदाय स्थित रहता है (अतः माताका गौरव पितासे भी अधिक है) ॥ ४३ ॥

एवं विमृशतस्तस्य चिरकारितया बहु । दीर्घः कालो व्यतिक्रान्तस्ततोऽस्याभ्यागमत् पिता ॥ ४४ ॥ विलम्ब करनेका स्वभाव होनेके कारण चिरकारी इस प्रकार सोचता-विचारता रहा। इसी सोच-विचारमें बहुत अधिक समय व्यतीत हो गया। इतनेमें ही उसके पिता वनसे लौट आये ॥ ४४ ॥

मेधातिथिर्महाप्राज्ञो गौतमस्तपसि स्थितः । विमृश्य तेन कालेन पत्न्याः संस्थाव्यतिक्रमम् ॥ ४५ ॥ सोऽब्रवीद् भृशसंतप्तो दुःखैनाश्रूणि वर्तयन् । श्रुतधैर्यप्रसादेन पश्चात्तापमुपागतः ॥ ४६ ॥ महाज्ञानी तपोनिष्ठ मेधातिथि गौतम उस समय पत्नीके वधके अनौचित्यपर विचार करके अधिक संतप्त हो गये। वे दुःखसे आँसू बहाते हुए वेदाध्ययन और धैर्यके प्रभावसे किसी तरह अपनेको सँभाले रहे और पश्चात्ताप करते हुए मन-ही-मन इस प्रकार कहने लगे — ॥ ४५-४६ ॥

आश्रमं मम सम्प्राप्तस्त्रिलोकेशः पुरंदरः । अतिथिव्रतमास्थाय ब्राह्मणं रूपमास्थितः ॥ ४७ ॥ स मया सान्त्वितो वाग्भिः स्वागतेनाभिपूजितः । अर्घ्यं पाद्यं यथान्यायं मया च प्रतिपादितः ॥ ४८ ॥ 'अहो! त्रिभुवनका स्वामी इन्द्र ब्राह्मणका रूप धारण करके मेरे आश्रमपर आया था। मैंने अतिथि-सत्कारके गृहस्थोचित व्रतका आश्रय लेकर उसे मीठे वचनोंद्वारा सान्त्वना दी, उसका स्वागत-सत्कार किया और यथोचित रूपसे अर्घ्य-पाद्य आदि निवेदन करके मैंने स्वयं ही उसकी विधिवत् पूजा की ॥ ४७-४८ ॥

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