भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1715

परवानस्मि चेत्युक्तः प्रणयिष्यति तेन च । अत्र चाकुशले जाते स्त्रिया नास्ति व्यतिक्रमः ॥ ४९ ॥ ‘मैंने विनयपूर्वक कहा—‘भगवन्! मैं आपके अधीन हूँ। आपके पदार्पणसे मैं सनाथ हो गया।’ मुझे आशा थी कि मेरे इस सद्व्यवहारसे संतुष्ट होकर अतिथिदेवता मुझसे प्रेम करेंगे; परंतु यहाँ इन्द्रकी विषयलोलुपताके कारण दुःखद घटना घटित हो गयी। इसमें मेरी स्त्रीका कोई अपराध नहीं ॥ ४९ ॥ एवं न स्त्री न चैवाहं नाध्वगस्त्रिदशेश्वरः । अपराध्यति धर्मस्य प्रमादस्त्वपराध्यति ॥ ५० ॥ ‘इस प्रकार न तो स्त्री अपराधिनी है, न मैं अपराधी हूँ और न एक पथिक ब्राह्मणके वेशमें आया हुआ देवताओंका राजा इन्द्र ही अपराधी है। मेरे द्वारा धर्मके विषयमें जो स्त्रीवधरूप प्रमाद हुआ है, वही इस अपराधकी जड़ है ॥ ५० ॥