महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1760, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंधनार्थी यदि विप्रोऽयं धनमस्मै प्रदीयताम् ॥ २१ ॥ **मणिभद्र बोले—**कुण्डधार! उठो, उठो; तुम्हारा कल्याण हो, तुम कृतकृत्य और सुखी हो जाओ। यदि यह ब्राह्मण धन चाहता तो इसे धन दे दिया जाय ॥ २१ ॥ यावद् धनं प्रार्थयते ब्राह्मणोऽयं सखा तव । देवानां शासनात् तावदसंख्येयं ददाम्यहम् ॥ २२ ॥ तुम्हारा सखा यह ब्राह्मण जितना धन चाहता हो, देवताओंकी आज्ञासे मैं उतना ही अथवा असंख्य धन इसे दे रहा हूँ ॥ २२ ॥ विचार्य कुण्डधारस्तु मानुष्यं चलमध्रुवम् । तपसे मतिमाधत्त ब्राह्मणस्य युधिष्ठिर ॥ २३ ॥ युधिष्ठिर! परंतु कुण्डधारने यह सोचकर कि मानव-जीवन चंचल एवं अस्थिर है, उस ब्राह्मणके तपोबलको भी बढ़ानेका विचार किया ॥ २३ ॥
कुण्डधार उवाच
नाहं धनानि याचामि ब्राह्मणाय धनप्रद ॥ २४ ॥ अन्यमेवाहमिच्छामि भक्तायानुग्रहं कृतम् । पृथिवीं रत्नपूर्णां वा महद् वा रत्नसंचयम् ॥ २५ ॥ भक्ताय नाहमिच्छामि भवेदेष तु धार्मिकः । धर्मेऽस्य रमतां बुद्धिर्धर्मं चैवोपजीवतु । धर्मप्रधानो भवतु ममैषोऽनुग्रहो मतः ॥ २६ ॥ **कुण्डधार बोला—**धनदाता देव! मैं ब्राह्मणके लिये धनकी याचना नहीं करता हूँ। मेरी इच्छा है कि मेरे इस भक्तपर किसी और प्रकारका ही अनुग्रह किया जाय। मैं अपने इस भक्तको रत्नोंसे भरी हुई पृथ्वी अथवा रत्नोंका विशाल भण्डार नहीं देना चाहता। मेरी तो यह इच्छा है कि यह धर्मात्मा हो। इसकी बुद्धि धर्ममें लगी रहे तथा यह धर्मसे ही जीवन-निर्वाह करे। इसके जीवनमें धर्मकी ही प्रधानता रहे। इसीको मैं इसके लिये महान् अनुग्रह मानता हूँ ॥ २४—२६ ॥
मणिभद्र उवाच
सदा धर्मफलं राज्यं सुखानि विविधानि च । फलान्येवायमश्नातु कायक्लेशविवर्जितः ॥ २७ ॥ **मणिभद्र बोला—**धर्मके फल तो सदा राज्य और नाना प्रकारके सुख ही हैं; अतः यह ब्राह्मण शारीरिक कष्टसे रहित हो केवल उन फलोंका ही उपभोग करे ॥ २७ ॥
भीष्म उवाच
ततस्तदेव बहुशः कुण्डधारो महायशाः ।