महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1761, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभ्यासमकरोद् धर्मे ततस्तुष्टास्तु देवताः ॥ २८ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! मणिभद्रके ऐसा कहनेपर भी महायशस्वी कुण्डधारने बार-बार अपनी वही बात दुहरायी। ब्राह्मणका धर्म बढ़े, इसीके लिये आग्रह किया। इससे सब देवता संतुष्ट हो गये ॥ २८ ॥
मणिभद्र उवाच प्रीतास्ते देवताः सर्वा द्विजस्यास्य तथैव च । भविष्यत्येष धर्मात्मा धर्मे चाधास्यते मतिः ॥ २९ ॥ **तब मणिभद्रने कहा—**कुण्डधार! सब देवता तुमपर और इस ब्राह्मणपर भी बहुत प्रसन्न हैं। यह धर्मात्मा होगा और इसकी बुद्धि धर्ममें ही लगी रहेगी ॥ ततः प्रीतो जलधरः कृतकार्यो युधिष्ठिर । ईप्सितं मनसो लब्ध्वा वरमन्यैः सुदुर्लभम् ॥ ३० ॥ युधिष्ठिर! इस प्रकार दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ मनोवाञ्छित वर पाकर कृतकृत्य एवं सफल-मनोरथ हो वह मेघ बड़ा प्रसन्न हुआ ॥ ३० ॥ ततोऽपश्यत चीराणि सूक्ष्माणि द्विजसत्तमः । पार्श्वतोऽभ्याशतो न्यस्तान्यथ निर्वेदमागतः ॥ ३१ ॥ तत्पश्चात् उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने अपने निकट अगल-बगलमें रखे हुए बहुत-से सूक्ष्म चीर (वल्कल आदि) देखे। इससे उसके मनमें बड़ा खेद एवं वैराग्य हुआ ॥ ३१ ॥
ब्राह्मण उवाच अयं न सुकृतं वेत्ति कोन्वन्यो वेत्स्यते कृतम् । गच्छामि वनमेवाहं वरं धर्मेण जीवितुम् ॥ ३२ ॥ **ब्राह्मण मन-ही-मन बोला—**जब मेरे इस पुण्यमय तपका उद्देश्य यह कुण्डधार ही नहीं समझ पा रहा है, तब दूसरा कौन जानेगा! अच्छा, अब मैं वनको ही चलता हूँ। धर्ममय जीवन बिताना ही अच्छा है ॥ ३२ ॥
भीष्म उवाच निर्वेदाद् देवतानां च प्रसादात् स द्विजोत्तमः । वनं प्रविश्य सुमहत् तप आरब्धवांस्तदा ॥ ३३ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! वैराग्य और देवताओंके कृपाप्रसादसे वनमें जाकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने उस समय बड़ी भारी तपस्या आरम्भ की ॥ ३३ ॥ देवतातिथिशेषेण फलमूलाशनो द्विजः । धर्मे चास्य महाराज दृढा बुद्धिरजायत ॥ ३४ ॥