भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1767

परंतप युधिष्ठिर! उस ब्राह्मणने वनमें तपस्याद्वारा सिद्धि लाभ करके समस्त प्राणियोंमेंसे किसीकी भी हिंसा न करते हुए मूल और फलोंद्वारा भी स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाले यज्ञका अनुष्ठान किया ।। ५ ।।

तस्य भार्या व्रतकृशा शुचिः पुष्करधारिणी ।
यज्ञपत्नी समानीता सत्येनानुविधीयते ॥ ६ ॥
उस ब्राह्मणके एक पत्नी थी, जिसका नाम था पुष्करधारिणी। उसके आचार-विचार परम पवित्र थे। वह व्रत-उपवास करते-करते दुर्बल हो गयी थी। ब्राह्मणका नाम सत्य था। यद्यपि वह ब्राह्मणी अपने पति सत्यके हिंसाप्रधान यज्ञकी इच्छा प्रकट करनेपर उसके अनुकूल नहीं होती थी, तो भी ब्राह्मण उसे यज्ञपत्नीके स्थानपर आग्रहपूर्वक बुला ही लाता था ।। ६ ।।

सा तु शापपरित्रस्ता तत्स्वभावानुवर्तिनी ।
मायूरजीर्णपर्णानां वस्त्रं तस्याश्च वर्णितम् ॥ ७ ॥
ब्राह्मणी शापसे डरकर पतिके स्वभावका सर्वथा अनुसरण करती थी। ऐसा कहा जाता है कि वह मोरोंकी टूटकर गिरी पुरानी पाँखोंको जोड़कर उनसे ही अपना शरीर ढँकती थी ।। ७ ।।

अकामया कृतस्तत्र यज्ञो होत्रनुशासनात् ।
शुक्रस्य पुनराजातिः पर्णादो नाम धर्मवित् ॥ ८ ॥
होताके आदेशसे इच्छा न होनेपर भी ब्राह्मण-पत्नीने उस यज्ञका कार्य सम्पन्न किया। होताका कार्य पर्णाद नामसे प्रसिद्ध एक धर्मज्ञ ऋषि करते थे, जो शुक्राचार्यके वंशज थे ।। ८ ।।

तस्मिन् वने समीपस्थो मृगोऽभूत् सहवासिकः ।
वचोभिरब्रवीत् सत्यं त्वयेदं दुष्कृतं कृतम् ॥ ९ ॥
उस वनमें सत्यका सहवासी एक मृग था, जो वहाँ पास ही रहता था। एक दिन उसने मनुष्यकी बोलीमें सत्यसे कहा—‘ब्राह्मण! तुमने यज्ञके नामपर यह दुष्कर्म किया है ।। ९ ।।

यदि मन्त्राङ्गहीनोऽयं यज्ञो भवति वै कृतः ।
मां भोः प्रक्षिप होत्रे त्वं गच्छ स्वर्गमनिन्दितः ॥ १० ॥
‘यदि किया हुआ यज्ञ मन्त्र और अंगसे हीन हो तो वह यजमानके लिये दुष्कर्म ही है। ब्राह्मणदेव! तुम मुझे होताको सौंप दो और स्वयं निन्दारहित होकर स्वर्गलोकमें जाओ' ।। १० ।।

ततस्तु यज्ञे सावित्री साक्षात् तं संयमन्त्रयत् ।
निमन्त्रयन्ती प्रत्युक्ता न हन्यां सहवासिनम् ॥ ११ ॥