महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1768, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर उस यज्ञमें साक्षात् सावित्रीने पधारकर उस ब्राह्मणको मृगकी आहुति देनेकी सलाह दी। ब्राह्मणने यह कहकर कि मैं अपने सहवासी मृगका वध नहीं कर सकता, सावित्रीकी आज्ञा माननेसे इनकार कर दी ॥ ११ ॥ एवमुक्ता निवृत्ता सा प्रविश यज्ञपावकम् । किं नु दुष्चरितं यज्ञे दिदृक्षुः सा रसातलम् ॥ १२ ॥ ब्राह्मणसे इस प्रकार कोरा जवाब मिल जानेपर सावित्रीदेवी लौट पड़ीं और यज्ञाग्निमें प्रविष्ट हो गयीं। यज्ञमें कौन-सा दुष्कर्म या त्रुटि है—यही देखनेकी इच्छासे वे आयी थीं और फिर रसातलमें चली गयीं ॥ १२ ॥ स तु बद्धाञ्जलिं सत्यमयाचद्धरिणः पुनः । सत्येन स परिष्वज्य संदिष्टो गम्यतामिति ॥ १३ ॥ सत्य सावित्रीदेवीकी ओर हाथ जोड़कर खड़ा था। इतनेहीमें उस हरिणने पुनः अपनी आहुति देनेके लिये याचना की। सत्यने मृगको हृदयसे लगा लिया और बड़े प्यारसे कहा—'तुम यहाँसे चले जाओ' ॥ १३ ॥ ततः स हरिणो गत्वा पदान्यष्टौ न्यवर्तत । साधु हिंसय मां सत्य हतो यास्यामि सद्गतिम् ॥ १४ ॥ तब वह हरिण आठ पग आगे जाकर लौट पड़ा और बोला—'सत्य! तुम विधिपूर्वक मेरी हिंसा करो। मैं यज्ञमें वधको प्राप्त होकर उत्तम गति पा लूँगा ॥ १४ ॥ पश्य ह्यप्सरसो दिव्य मया दत्तेन चक्षुषा । विमानानि विचित्राणि गन्धर्वाणां महात्मनाम् ॥ १५ ॥ 'मैंने तुम्हें दिव्यदृष्टि प्रदान की है; उससे देखो, आकाशमें वे दिव्य अप्सराएँ खड़ी हैं। महात्मा गन्धर्वोंके विचित्र विमान भी शोभा पा रहे हैं' ॥ १५ ॥ ततः स सुचिरं दृष्ट्वा स्पृहालग्रेन चक्षुषा । मृगमालोक्य हिंसायां स्वर्गवासं समर्थयत् ॥ १६ ॥ सत्यकी आँखें बड़ी चाहसे उधर ही जा लगीं। उसने बड़ी देरतक वह रमणीय दृश्य देखा, फिर मृगकी ओर दृष्टिपात करके 'हिंसा करनेपर ही मुझे स्वर्गवासका सुख मिल सकता है' यह मन-ही-मन निश्चय किया ॥ १६ ॥ स तु धर्मो मृगो भूत्वा बहुवर्षोषितो वने । तस्य निष्कृतिमाधत्त न त्वसौ यज्ञसंविधिः ॥ १७ ॥ वास्तवमें उस मृगके रूपमें साक्षात् धर्म थे, जो मृगका शरीर धारण करके बहुत वर्षोंसे वनमें निवास करते थे। पशुहिंसा यज्ञकी विधिके प्रतिकूल कर्म है। भगवान् धर्मने उस ब्राह्मणका उद्धार करनेका विचार किया ॥ १७ ॥ तस्य तेनानुभावेन मृगहिंसात्मनस्तदा । तपो महत्समुच्छिन्नं तस्माद्धिंसा न यज्ञिया ॥ १८ ॥