महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1771, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोभमोहाभिभूतस्य रागद्वेषान्वितस्य च । न धर्मे जायते बुद्धिव्र्व्याजाद् धर्मं करोति च ॥ ६ ॥ लोभ और मोहसे घिरे हुए तथा राग-द्वेषके वशीभूत हुए मनुष्यकी बुद्धि धर्ममें नहीं लगती है। वह किसी-न-किसी बहानेसे दिखाऊ धर्मका आचरण करता है ॥ ६ ॥ व्याजेन चरते धर्ममर्थं व्याजेन रोचते । व्याजेन सिद्ध्यमानेषु धनेषु कुरुनन्दन ॥ ७ ॥ तत्रैव कुरुते बुद्धिं ततः पापं चिकीर्षति । सुहृद्भिर्वार्यमाणोऽपि पण्डितैश्चापि भारत ॥ ८ ॥ उत्तरं न्यायसम्बद्धं ब्रवीति विधिचोदितम् । कुरुनन्दन! वह कोई बहाना लेकर ही धर्म करता है, कपटसे ही धन कमानेकी रुचि रखता है और यदि कपटसे धन प्राप्त करनेमें सफलता मिल गयी तो वह उसीमें अपनी सारी बुद्धि लगा देता है। भरतनन्दन! फिर तो विद्वानों और सुहृदोंके मना करनेपर भी वह केवल पाप ही करना चाहता है तथा मना करनेवालोंको धर्मशास्त्रके वाक्योंके द्वारा प्रतिपादित न्याययुक्त उत्तर दे देता है ॥ ७-८ १/२ ॥ अधर्मस्त्रिविधस्तस्य वर्धते रागमोहजः ॥ ९ ॥ पापं चिन्तयते चैव प्रब्रवीति करोति च । उसका राग और मोहजनित तीन प्रकारका अधर्म बढ़ता है। वह मनसे पापकी ही बात सोचता है, वाणीसे पाप ही बोलता है और क्रियाद्वारा पाप ही करता है ॥ तस्याधर्मप्रवृत्तस्य दोषान् पश्यन्ति साधवः ॥ १० ॥ एकशीलाश्च मित्रत्वं भजन्ते पापकर्मिणः । स नेह सुखमाप्नोति कुत एव परत्र वै ॥ ११ ॥ श्रेष्ठ पुरुष तो अधर्ममें प्रवृत्त हुए मनुष्यके दोष जानते हैं; परंतु उस पापीके समान स्वभाववाले पापाचारी मनुष्य उसके साथ मित्रता स्थापित करते हैं। ऐसा पुरुष इस लोकमें ही सुख नहीं पाता है, फिर परलोकमें तो पा ही कैसे सकता है ॥ १०-११ ॥ एवं भवति पापात्मा धर्मात्मानं तु मे शृणु । यथा कुशलधर्मा स कुशलं प्रतिपद्यते ॥ १२ ॥ कुशलेनैव धर्मेण गतिमिष्टां प्रपद्यते । इस प्रकार मनुष्य पापात्मा हो जाता है। अब धर्मात्माके विषयमें मुझसे सुनो। वह जिस प्रकार परहित-साधक कल्याणकारी धर्मका आचरण करता है, उसी प्रकार कल्याणका भागी होता है। वह क्षेमकारक धर्मके प्रभावसे ही अभीष्ट गतिको प्राप्त होता है ॥ १२ १/२ ॥ य एतान् प्रज्ञया दोषान् पूर्वमेवानुपश्यति ॥ १३ ॥ कुशलः सुखदुःखानां साधूंश्चाप्यथ सेवते ।