भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1772

तस्य साधुसमाचारादभ्यासाच्चैव वर्धते ॥ १४ ॥
जो पुरुष अपनी बुद्धिसे राग आदि दोषोंको पहले ही देख लेता है, वह सुख-दुःखको समझनेमें कुशल होता है। फिर वह श्रेष्ठ पुरुषोंका सेवन करता है। सत्पुरुषोंकी सेवा या सत्संगसे और सत्कर्मोंके अभ्याससे उस पुरुषकी बुद्धि बढ़ती है ।। १३-१४ ।।
प्रज्ञा धर्मे च रमते धर्मं चैवोपजीवति ।
सोऽथ धर्मादवाप्तेषु धनेषु कुरुते मनः ॥ १५ ॥
वह बढ़ी हुई बुद्धि धर्ममें ही सुख मानती और उसीका सहारा लेती है। वह पुरुष धर्मसे प्राप्त होनेवाले धनमें मन लगाता है ।। १५ ।।
तस्यैव सिञ्चते मूलं गुणान् पश्यति तत्र वै ।
धर्मात्मा भवति ह्येवं मित्रं च लभते शुभम् ॥ १६ ॥
वह जहाँ गुण देखता है, उसीके मूलको सींचता है। ऐसा करनेसे वह पुरुष धर्मात्मा होता है और शुभकारक मित्र प्राप्त करता है ।। १६ ।।
स मित्रधनलाभात् तु प्रेत्य चेह च नन्दति ।
शब्दे स्पर्शे रसे रूपे तथा गन्धे च भारत ॥ १७ ॥
प्रभुत्वं लभते जन्तुर्धर्मस्यैतत् फलं विदुः ।
स तु धर्मफलं लब्ध्वा न हृष्यति युधिष्ठिर ॥ १८ ॥
भारत! उत्तम मित्र और धनके लाभसे वह इहलोक और परलोकमें भी आनन्दित होता है। ऐसा पुरुष शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—इन पाँचों विषयोंपर प्रभुत्व प्राप्त कर लेता है। इसे धर्मका फल माना जाता है। युधिष्ठिर! वह धर्मका फल पाकर भी हर्षसे फूल नहीं उठता है ।।
अतृप्यमाणो निर्वेदमादत्ते ज्ञानचक्षुषा ।
प्रज्ञाचक्षुर्यदा कामे रसे गन्धे न रज्यते ॥ १९ ॥
शब्दे स्पर्शे तथा रूपे न च भावयते मनः ।
विमुच्यते तदा कामान्न च धर्मं विमुञ्चति ॥ २० ॥
वह इससे तृप्त न होनेके कारण विवेकदृष्टिसे वैराग्यको ही ग्रहण करता है, बुद्धिरूप नेत्रके खुल जानेके कारण जब वह कामोपभोग, रस और गन्धमें अनुरक्त नहीं होता तथा शब्द, स्पर्श और रूपमें भी उसका चित्त नहीं फँसता, तब वह सब कामनाओंसे मुक्त हो जाता है और धर्मका त्याग नहीं करता ।।
सर्वत्यागे च यतते दृष्ट्वा लोकं क्षयात्मकम् ।
ततो मोक्षाय यतते नानुपायादुपायतः ॥ २१ ॥
शनैर्निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च ।
धर्मात्मा चैव भवति मोक्षं च लभते परम् ॥ २२ ॥