भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1795, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1795

साधारण (लौकिक) लाभकी इच्छा न करे। जहाँ विशेष आदर एवं पूजा होती हो, वहाँ भोजन न करे। मुमुक्षु पुरुषको आदर-सत्कारके लाभकी तो निन्दा करनी चाहिये ।। ११ ।। न चान्नदोषान् निन्देत न गुणानभिपूजयेत् । शय्यासने विविक्ते च नित्यमेवाभिपूजयेत् ।। १२ ।। भिक्षामें मिले हुए अन्नके दोष बताकर उनकी निन्दा न करे और न उसके गुण बताकर उन गुणोंकी प्रशंसा ही करे। सोने और बैठनेके लिये सदा एकान्तका ही आदर करे ।। १२ ।। शून्यागारं वृक्षमूलमरण्यमथवा गुहाम् । अज्ञातचर्यां गत्वान्यां ततोऽन्यत्रैव संविशेत् ।। १३ ।। सूने घर, वृक्षकी जड़, जंगल अथवा पर्वतकी गुफामें अथवा अन्य किसी गुप्त स्थानमें अज्ञातभावसे रहकर आत्मचिन्तनमें ही लगा रहे ।। १३ ।। अनुरोधविरोधाभ्यां समः स्यादचलो ध्रुवः । सुकृतं दुष्कृतं चोभे नानुरुध्येत कर्मणा ।। १४ ।। लोगोंके अनुरोध या विरोध करनेपर भी सदा समभावसे रहे, निश्चल एवं स्थिरचित्त हो जाय तथा अपने कर्मोंद्वारा पुण्य एवं पापका अनुसरण न करे ।। १४ ।। नित्यतृप्तः सुसंतुष्टः प्रसन्नवदनेन्द्रियः । विभीर्जप्यपरो मौनी वैराग्यं समुपाश्रितः ।। १५ ।। सर्वदा तृप्त और संतुष्ट रहे। मुख और इन्द्रियोंको प्रसन्न रखे। भयको पास न आने दे। प्रणव आदिका जप करता रहे तथा वैराग्यका आश्रय ले मौन रहे ।। १५ ।। अभ्यस्तं भौतिकं पश्यन् भूतानामागतिं गतिम् । निःस्पृहः समदर्शी च पक्वापक्वेन वर्तयन् । आत्मना यः प्रशान्तात्मा लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ।। १६ ।। भौतिक देह, इन्द्रिय आदि सभी वस्तुएँ नष्ट होनेवाली हैं और प्राणियोंके आवागमन—जन्म और मरण—बारंबार होते रहते हैं। यह सब देख और सोचकर जो सर्वत्र निःस्पृह तथा समदर्शी हो गया है, पके (रोटी, भात आदि) और कच्चे (फल, मूल आदि) से जीवन-निर्वाह करता है, आत्मलाभके लिये जो शान्तचित्त हो गया है तथा जो मिताहारी और जितेन्द्रिय है, वही वास्तवमें संन्यासी कहलाने योग्य है ।। वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं हिंसावेगमुदरोपस्थवेगम् । एतान् वेगान् विषहेद् वै तपस्वी निन्दा चास्य हृदयं नोपहन्यात् ।। १७ ।। संन्यासी तपस्वी होकर वाणी, मन, क्रोध, हिंसा, उदर और उपस्थ—इनके वेगोंको सहता हुआ इन्हें वशमें रखे। दूसरोंद्वारा की हुई निन्दा उसके हृदयमें कोई विकार न उत्पन्न

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व · पृष्ठ 1795, कुल 2450 में से · BharatKosha