महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1796, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरे ।। १७ ।। मध्यस्थ एव तिष्ठेत प्रशंसानिन्दयोः समः । एतत् पवित्रं परमं परिव्राजक आश्रमे ।। १८ ।। प्रशंसा और निन्दा—दोनोंमें समान भाव रखकर उदासीन ही रहना चाहिये। संन्यासाश्रममें इस प्रकारका आचरण परम पवित्र माना गया है ।। १८ ।। महात्मा सर्वतो दान्तः सर्वत्रैवानपाश्रितः । अपूर्वचारकः सौम्यो अनिकेतः समाहितः ।। १९ ।। संन्यासीको महामनस्वी, सब प्रकारसे जितेन्द्रिय, सब ओरसे असंग, सौम्य, मठ और कुटियासे रहित तथा एकाग्रचित होना चाहिये। उसे अपने पूर्व आश्रमके परिचित स्थानोंमें नहीं विचरना चाहिये ।। १९ ।। वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां न संसृज्येत कर्हिचित् । अज्ञातलिप्सं लिप्सेत न चैनं हर्ष आविशेत् ।। २० ।। वानप्रस्थों और गृहस्थोंके साथ उसे कभी संसर्ग नहीं रखना चाहिये। अपनी रुचि प्रकट किये बिना ही जो वस्तु प्राप्त हो जाय, उसीको लेनेकी इच्छा रखनी चाहिये तथा अभीष्ट वस्तुके मिलनेपर उसके मनमें हर्षका आवेश नहीं होना चाहिये ।। २० ।। विजानतां मोक्ष एष श्रमः स्यादविजानताम् । मोक्षयानमिदं कृत्स्नं विदुषां हारितोऽब्रवीत् ।। २१ ।। यह संन्यासाश्रम ज्ञानियोंके लिये तो मोक्षरूप है, परंतु अज्ञानियोंके लिये श्रमरूप ही है। हारीत मुनिने विद्वानोंके लिये इस सम्पूर्ण धर्मको मोक्षका विमान बताया है ।। २१ ।। अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यः प्रव्रजेद् गृहात् । लोकास्तेजोमयास्तस्य तथाऽऽनन्त्याय कल्पते ।। २२ ।। जो पुरुष सबको अभय-दान देकर घरसे निकल जाता है, उसे तेजोमय लोकोंकी प्राप्ति होती है तथा वह अनन्त परमात्मपदको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है ।। २२ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि हारीतगीतायां अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २७८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें हारीतगीताविषयक दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २७८ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुछ २३ श्लोक हैं)