भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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इस प्रकार मनुष्यको इन्हीं दो कारणोंसे ये भिन्न-भिन्न प्रकारके दुःख प्राप्त होते हैं। विषयोंकी आसक्तिसे भी ये दुःख प्राप्त होते हैं ।। १३ ।। जरामृत्यू हि भूतानां खादितारौ वृकाविव । बलिनां दुर्बलानां च ह्रस्वानां महतामपि ।। १४ ।। बुढ़ापा और मृत्यु—ये दोनों दो भेड़ियोंके समान हैं, जो बलवान् दुर्बल, छोटे और बड़े सभी प्राणियोंको खा जाते हैं ।। १४ ।। न कश्चिज्जात्वतिक्रामेज्जरामृत्यू हि मानवः । अपि सागरपर्यन्तां विजित्येमां वसुन्धराम् ।। १५ ।। कोई भी मनुष्य कभी बुढ़ापे और मौतको लाँघ नहीं सकता। भले ही वह समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीपर विजय पा चुका हो ।। १५ ।। सुखं वा यदि वा दुःखं भूतानां पर्युपस्थितम् । प्राप्तव्यमवशैः सर्वं परिहारो न विद्यते ।। १६ ।। प्राणियोंके निकट जो सुख या दुःख उपस्थित होता है, वह सब उन्हें विवश होकर सहना ही पड़ता है, क्योंकि उसके टालनेका कोई उपाय नहीं है ।। १६ ।। पूर्वे वयसि मध्ये वाप्युत्तरे वा नराधिप । अवर्जनीयास्तेऽर्था वै कांक्षिता ये ततोऽन्यथा ।। १७ ।। नरेश्वर! पूर्वावस्था, मध्यावस्था अथवा उत्तरावस्थामें कभी-न-कभी वे क्लेश अनिवार्यरूपसे प्राप्त होते ही हैं, जिन्हें मनुष्य उनके विपरीतरूपमें चाहता है (अर्थात् सुख-ही-सुखकी इच्छा करता है; परंतु उसे कष्ट भी प्राप्त होते ही हैं) ।। १७ ।। अप्रियैः सह संयोगो विप्रयोगश्च सुप्रियैः । अर्थानर्थौ सुखं दुःखं विधानमनुवर्तते ।। १८ ।। अप्रिय वस्तुओंके साथ संयोग, अत्यन्त प्रिय वस्तुओंका वियोग, अर्थ, अनर्थ, सुख और दुःख—इन सबकी प्राप्ति प्रारब्धके विधानके अनुसार होती है ।। १८ ।। प्रादुर्भावश्च भूतानां देहत्यागस्तथैव च । प्राप्तिर्व्यायामयोगश्च सर्वमेतत् प्रतिष्ठितम् ।। १९ ।। प्राणियोंकी उत्पत्ति, देहावसान, लाभ* और हानि—ये सब प्रारब्धके ही आधारपर स्थित हैं ।। १९ ।। गन्धवर्णरसस्पर्शा निवर्तन्ते स्वभावतः । तथैव सुखदुःखानि विधानमनुवर्तते ।। २० ।। जैसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध स्वभावतः आते-जाते रहते हैं, उसी प्रकार मनुष्य सुख और दुःखोंको प्रारब्धानुसार पाता रहता है ।। २० ।। आसनं शयनं यानमुत्थानं पानभोजनम् । नियतं सर्वभूतानां कालेनैव भवत्युत ।। २१ ।।