महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 182, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअकिञ्चनाश्च दृश्यन्ते पुरुषाश्चिरजीविनः ।
समृद्धे च कुले जाता विनश्यन्ति पतंगवत् ॥ २८ ॥
जिनके पास कुछ नहीं है, ऐसे दरिद्र भी दीर्घजीवी देखे जाते हैं और धनवान् कुलमें उत्पन्न हुए मनुष्य भी कीट-पतंगोंके समान नष्ट होते रहते हैं ॥
प्रायेण श्रीमतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते ।
काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वशः ॥ २९ ॥
जगत्में प्रायः धनवानोंको खाने और पचानेकी शक्ति ही नहीं रहती है और दरिद्रोंके पेटमें काठ भी पच जाते हैं ॥ २९ ॥
अहमेतत् करोमीति मन्यते कालनोदितः ।
यद् यदिष्टमसंतोषाद् दुरात्मा पापमाचरेत् ॥ ३० ॥
दुरात्मा मनुष्य कालसे प्रेरित होकर यह अभिमान करने लगता है कि मैं यह करूँगा। तत्पश्चात् असंतोषवश उसे जो-जो अभीष्ट होता है, उस पापपूर्ण कृत्यको भी वह करने लगता है ॥ ३० ॥
मृगयाक्षाः स्त्रियः पानं प्रसंगा निन्दिता बुधैः ।
दृश्यन्ते पुरुषाश्चात्र सम्प्रयुक्ता बहुश्रुताः ॥ ३१ ॥
विद्वान् पुरुष शिकार करने, जूआ खेलने, स्त्रियोंके संसर्गमें रहने और मदिरा पीनेके प्रसंगोंकी बड़ी निन्दा करते हैं, परंतु इन पापकर्मोंमें अनेक शास्त्रोंके श्रवण और अध्ययनसे सम्पन्न पुरुष भी संलग्न देखे जाते हैं ॥
इति कालेन सर्वार्थानीप्सितानीप्सितानिह ।
स्पृशन्ति सर्वभूतानि निमित्तं नोपलभ्यते ॥ ३२ ॥
इस प्रकार कालके प्रभावसे समस्त प्राणी इष्ट और अनिष्ट पदार्थोंको प्राप्त करते रहते हैं, इस इष्ट और अनिष्टकी प्राप्तिका अदृष्टके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं दिखायी देता ॥ ३२ ॥
वायुमाकाशमग्निं च चन्द्रादित्यावहःक्षपे ।
ज्योतींषि सरितः शैलान् कः करोति बिभर्ति च ॥ ३३ ॥
वायु, आकाश, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, दिन, रात, नक्षत्र, नदी और पर्वतोंको कालके सिवा कौन बनाता और धारण करता है? ॥ ३३ ॥
शीतमुष्णं तथा वर्षं कालेन परिवर्तते ।
एवमेव मनुष्याणां सुखदुःखे नरर्षभ ॥ ३४ ॥
सर्दी, गर्मी और वर्षाका चक्र भी कालसे ही चलता है। नरश्रेष्ठ! इसी प्रकार मनुष्योंके सुख-दुःख भी कालसे ही प्राप्त होते हैं ॥ ३४ ॥
नौषधानि न मन्त्राश्च न होमा न पुनर्जपाः ।
त्रायन्ते मृत्युनोपेतं जरया चापि मानवम् ॥ ३५ ॥