महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1848, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोकके निवासी भी वहाँ जुटे हुए थे और वे सब-के-सब हाथ जोड़कर प्रजापतिको प्रणाम करके उनकी सेवामें खड़े थे॥ ४-५॥ देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः। हाहाहूहूश्च गन्धर्वौ तुम्बुरुर्नारदस्तथा॥ ६॥ विश्वावसुर्विश्वसेनो गन्धर्वाप्सरसस्तथा। देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस, हाहा और हूहू नामक गन्धर्व, तुम्बुरु, नारद, विश्वावसु, विश्वसेन तथा दूसरे-दूसरे गन्धर्व और अप्सराएँ वहाँ उपस्थित थीं॥ ६१/२॥
आदित्या वसवो रुद्राः साध्याः सह मरुद्गणैः॥ ७॥ इन्द्रेण सहिताः सर्वे आगता यज्ञभागिनः। आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य और मरुद्गण—ये सब-के-सब इन्द्रके साथ यज्ञमें भाग लेनेके लिये वहाँ पधारे थे॥ ७१/२॥
ऊष्मपाः सोमपाश्चैव धूमपा आज्यपास्तथा॥ ८॥ ऋषयः पितरश्चैव आगता ब्रह्मणा सह। ऊष्मपा (सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले), सोमपा (सोमरस पीनेवाले), धूमपा (यज्ञमें धूम-पान करनेवाले) और आज्यपा (घृत-पान करनेवाले) पितर और ऋषि भी ब्रह्माजीके साथ उस यज्ञमें पधारे थे॥
एते चान्ये च बहवो भूतग्रामाश्चतुर्विधाः॥ ९॥ जरायुजाण्डजाश्चैव सहसा स्वेदजोद्भिदैः। ये तथा और भी बहुत-से चतुर्विध प्राणिसमुदाय जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज वहाँ उपस्थित हुए थे॥ ९१/२॥
आहूता मन्त्रिताः सर्वे देवाश्च सह पत्निभिः॥ १०॥ विराजन्ते विमानस्था दीप्यमाना इवाग्नयः। जिन्हें निमन्त्रित करके बुलाया गया था, वे सब देवता अपनी पत्नियोंके साथ विमानपर बैठकर आते समय प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे॥
तान् दृष्ट्वा मन्युनाऽऽविष्टो दधीचिर्वाक्यमब्रवीत्॥ ११॥ नायं यज्ञो न वा धर्मो यत्र रुद्रो न इज्यते। वधबन्धं प्रपन्ना वै किं नु कालस्य पर्ययः॥ १२॥ (महामुनि दधीचि भी उस यज्ञमण्डपमें उपस्थित थे। उन्होंने देखा कि देवता और दानव आदिका समाज तो खूब जुटा हुआ है; परंतु भगवान् शंकर दिखायी नहीं देते हैं। जान पड़ता है उनका आवाहन नहीं किया गया है। इससे उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ।) उन सब देवताओंको वहाँ उपस्थित देख दधीचि क्रोधमें भर गये और बोले—'सज्जनो! जिसमें भगवान् शिवकी पूजा नहीं होती है, वह न यज्ञ है और न धर्म। यह यज्ञ भी भगवान् शिवके