महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
उस समय पृथ्वी, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोकके निवासी भी वहाँ जुटे हुए थे और वे सब-के-सब हाथ जोड़कर प्रजापतिको प्रणाम करके उनकी सेवामें खड़े थे॥ ४-५॥ देवदानवगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः। हाहाहूहूश्च गन्धर्वौ तुम्बुरुर्नारदस्तथा॥ ६॥ विश्वावसुर्विश्वसेनो गन्धर्वाप्सरसस्तथा। देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस, हाहा और हूहू नामक गन्धर्व, तुम्बुरु, नारद, विश्वावसु, विश्वसेन तथा दूसरे-दूसरे गन्धर्व और अप्सराएँ वहाँ उपस्थित थीं॥ ६१/२॥
आदित्या वसवो रुद्राः साध्याः सह मरुद्गणैः॥ ७॥ इन्द्रेण सहिताः सर्वे आगता यज्ञभागिनः। आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य और मरुद्गण—ये सब-के-सब इन्द्रके साथ यज्ञमें भाग लेनेके लिये वहाँ पधारे थे॥ ७१/२॥
ऊष्मपाः सोमपाश्चैव धूमपा आज्यपास्तथा॥ ८॥ ऋषयः पितरश्चैव आगता ब्रह्मणा सह। ऊष्मपा (सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले), सोमपा (सोमरस पीनेवाले), धूमपा (यज्ञमें धूम-पान करनेवाले) और आज्यपा (घृत-पान करनेवाले) पितर और ऋषि भी ब्रह्माजीके साथ उस यज्ञमें पधारे थे॥
एते चान्ये च बहवो भूतग्रामाश्चतुर्विधाः॥ ९॥ जरायुजाण्डजाश्चैव सहसा स्वेदजोद्भिदैः। ये तथा और भी बहुत-से चतुर्विध प्राणिसमुदाय जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज वहाँ उपस्थित हुए थे॥ ९१/२॥
आहूता मन्त्रिताः सर्वे देवाश्च सह पत्निभिः॥ १०॥ विराजन्ते विमानस्था दीप्यमाना इवाग्नयः। जिन्हें निमन्त्रित करके बुलाया गया था, वे सब देवता अपनी पत्नियोंके साथ विमानपर बैठकर आते समय प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे॥
तान् दृष्ट्वा मन्युनाऽऽविष्टो दधीचिर्वाक्यमब्रवीत्॥ ११॥ नायं यज्ञो न वा धर्मो यत्र रुद्रो न इज्यते। वधबन्धं प्रपन्ना वै किं नु कालस्य पर्ययः॥ १२॥ (महामुनि दधीचि भी उस यज्ञमण्डपमें उपस्थित थे। उन्होंने देखा कि देवता और दानव आदिका समाज तो खूब जुटा हुआ है; परंतु भगवान् शंकर दिखायी नहीं देते हैं। जान पड़ता है उनका आवाहन नहीं किया गया है। इससे उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ।) उन सब देवताओंको वहाँ उपस्थित देख दधीचि क्रोधमें भर गये और बोले—'सज्जनो! जिसमें भगवान् शिवकी पूजा नहीं होती है, वह न यज्ञ है और न धर्म। यह यज्ञ भी भगवान् शिवके
बिना यज्ञ कहनेयोग्य नहीं रहा। इसका आयोजन करनेवाले लोग वध और बन्धनकी
दुर्दशामें पड़नेवाले हैं। अहो! कालका कैसा उलट-फेर है ।। ११-१२ ।।
किंनु मोहान्न पश्यन्ति विनाशं पर्युपस्थितम् ।
उपस्थितं महाघोरं न बुध्यन्ति महाध्वरे ॥ १३ ॥
'इस महायज्ञमें अत्यन्त घोर विनाश उपस्थित होनेवाला है; किंतु मोहवश कोई देख
नहीं रहे हैं—समझ नहीं पाते हैं' ॥ १३ ॥
इत्युक्त्वा स महायोगी पश्यति ध्यानचक्षुषा ।
स पश्यति महादेवं देवीं च वरदां शुभाम् ॥ १४ ॥
नारदं च महात्मानं तस्या देव्याः समीपतः ।
संतोषं परमं लेभे इति निश्चित्य योगवित् ॥ १५ ॥
एकमन्त्रास्तु ते सर्वे येनेशो न निमन्त्रितः ।
ऐसा कहकर महायोगी दधीचिने जब ध्यान लगाकर देखा, तब उन्हें भगवान् शंकर
और मंगलमयी वरदायिनी देवी पार्वतीजीका दर्शन हुआ। उनके पास ही महात्मा नारदजी
भी दिखायी दिये, इससे उनको बड़ा संतोष हुआ। योगवेत्ता दधीचिको यह निश्चय हो गया कि ये सब देवता एकमत हो गये हैं। इसीलिये इन्होंने महेश्वरको यहाँ निमन्त्रित नहीं किया है ।।
तस्माद् देशादपक्रम्य दधीचिर्वाक्यमब्रवीत् ।। १६ ।।
अपूज्यपूजनाच्चैव पूज्यानां चाप्यपूजनात् ।
नृघातकसमं पापं शश्वत् प्राप्नोति मानवः ।। १७ ।।
यह बात ध्यानमें आते ही दधीचि यज्ञशालासे अलग हो गये और दूर जाकर कहने लगे—‘सज्जनो! अपूजनीय पुरुषकी पूजा करनेसे और पूजनीय महापुरुषकी पूजा न करनेसे मनुष्य सदा ही नरहत्याके समान पापका भागी होता है ।। १६-१७ ।।
अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्ये कदाचन ।
देवतानामृषीणां च मध्ये सत्यं ब्रवीम्यहम् ।। १८ ।।
‘मैंने पहले कभी झूठ नहीं कहा है और आगे भी कभी झूठ नहीं कहूँगा। इन देवताओं तथा ऋषियोंके बीचमें मैं सच्ची बात कह रहा हूँ’ ।। १८ ।।
आगतं पशुभर्तारं स्रष्टारं जगतः पतिम् ।
अध्वरे ह्यग्रभोक्तारं सर्वेषां पश्यत प्रभुम् ।। १९ ।।
‘भगवान् शंकर सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करनेवाले, सम्पूर्ण जीवोंके रक्षक, स्वामी तथा सबके प्रभु हैं। तुम सब लोग देख लेना, वे इस यज्ञमें प्रधान भोक्ताके रूपमें उपस्थित होंगे’ ।। १९ ।।
दक्ष उवाच
सन्ति नो बहवो रुद्राः शूलहस्ताः कपर्दिनः ।
एकादशस्थानगता नाहं वेद्मि महेश्वरम् ।। २० ।।
**दक्षने कहा—**हाथोंमें शूल और मस्तकपर जटाजूट धारण करनेवाले बहुत-से रुद्र हमारे यहाँ रहते हैं। वे ग्यारह हैं और ग्यारह स्थानोंमें निवास करते हैं। उनके सिवा दूसरे किसी महेश्वरको मैं नहीं जानता ।। २० ।।
दधीचिरुवाच
सर्वेषामेव मन्त्रोऽयं येनासौ न निमन्त्रितः ।
यथाहं शंकरादूर्ध्वं नान्यं पश्यामि दैवतम् ।
तथा दक्षस्य विपुलो यज्ञोऽयं न भविष्यति ।। २१ ।।
**दधीचि बोले—**मैं जानता हूँ, आप सब लोगोंका ही यह मिल-जुलकर किया हुआ निश्चय है। इसीलिये उन महादेवजीको निमन्त्रित नहीं किया गया है; परंतु मैं भगवान् शंकरसे बढ़कर दूसरे किसी देवताको नहीं देखता। यदि यह सत्य है तो प्रजापति दक्षका यह विशाल यज्ञ निश्चय ही नष्ट हो जायगा ।। २१ ।।
दक्ष उवाच
एतन्मखेशाय सुवर्णपात्रे हविः समस्तं विधिमन्त्रपूतम् । विष्णोर्नयाम्यप्रतिमस्य भागं प्रभुर्विभुश्चाहवनीय एषः ॥ २२ ॥ **दक्षने कहा—**महर्षे! देखो, विधिपूर्वक मन्त्रसे पवित्र की हुई यह सारी हवि सुवर्णके पात्रमें रखी हुई है। यह यज्ञेश्वर श्रीविष्णुको समर्पित है। भगवान् विष्णुकी कहीं समता नहीं है। मैं उन्हींको हविष्यका यह भाग अर्पित करूँगा। ये भगवान् विष्णु ही सर्वसमर्थ, व्यापक और यज्ञभाग अर्पित करनेके योग्य हैं ॥ २२ ॥
देव्युवाच
किं नाम दानं नियमं तपो वा कुर्यामहं येन पतिर्ममाद्य । लभेत भागं भगवानचिन्त्यो ह्यर्धं तथा भागमथो तृतीयम् ॥ २३ ॥ (दूसरी ओर कैलास पर्वतपर) पार्वती देवी (बहुत दुखी होकर) कह रही थीं—आह, मैं कौन-सा व्रत, दान या तप करूँ, जिसके प्रभावसे आज मेरे पतिदेव अचिन्त्य भगवान् शंकरको यज्ञका आधा अथवा तिहाई भाग अवश्य प्राप्त हो?' ॥ २३ ॥
एवं ब्रुवाणां भगवान् स पत्नीं प्रहृष्टरूपः क्षुभितामुवाच । न वेत्सि मां देवि कृशोदराङ्गि किं नाम युक्तं वचनं मखेशे ॥ २४ ॥ क्षोभमें भरकर इस प्रकार बोलती हुई पत्नीकी बात सुनकर भगवान् शंकर हर्षसे खिल उठे और इस प्रकार बोले—‘देवि! कृशोदराङ्गि! तू मुझे नहीं जानती, मैं सम्पूर्ण यज्ञोंका ईश्वर हूँ। मेरे विषयमें किस प्रकारके वचन कहना चाहिये, यह भी तुम नहीं जानती ॥ २४ ॥
अहं विजानामि विशालनेत्रे ध्यानेन हीना न विदन्त्यसन्तः । तवाद्य मोहेन च सेन्द्रदेवा लोकास्त्रयः सर्वत एव मूढाः ॥ २५ ॥ ‘पर मैं सब कुछ जानता हूँ। विशाललोचने! जिनका चित्त एकाग्र नहीं है, वे ध्यानशून्य असाधु पुरुष मेरे स्वरूपको नहीं जानते। आज तुम्हारे इस मोहसे इन्द्र आदि देवताओंसहित तीनों लोक सब ओरसे किंकर्तव्य-विमूढ हो गये हैं ॥ २५ ॥
मामध्वरे शंसितारः स्तुवन्ति रथन्तरं सामगाश्चोपगान्ति । मां ब्राह्मणा ब्रह्मविदो यजन्ते ममाध्वर्यवः कल्पयन्ते च भागम् ॥ २६ ॥ 'यज्ञमें प्रस्तोतालोग मेरी स्तुति करते हैं। सामगान करनेवाले ब्राह्मण रथन्तर सामके रूपमें मेरी ही महिमाका गान करते हैं। वेदवेत्ता विप्र मेरा ही यजन करते और ऋत्विज्लोग यज्ञमें मुझे ही भाग अर्पित करते हैं' ॥ २६ ॥
देव्युवाच
सुप्राकृतोऽपि पुरुषः सर्वः स्त्रीजनसंसदि । स्तौति गर्वायते चापि स्वमात्मानं न संशयः ॥ २७ ॥ देवीने कहा—नाथ! अत्यन्त गँवार पुरुष भी क्यों न हो, प्रायः सभी स्त्रियोंके बीचमें अपनी प्रशंसाके गीत गाते और अपनी श्रेष्ठतापर गर्व करते हैं—इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ २७ ॥
श्रीभगवानुवाच
नात्मानं स्तौमि देवेशि पश्य मे तनुमध्यमे । यं स्रक्ष्यामि वरारोहे यागार्थे वरवर्णिनि ॥ २८ ॥ श्रीभगवान् शिव बोले—देवेश्वरि! तनुमध्यमे! वरारोहे! वरवर्णिनि! मैं अपनी प्रशंसा नहीं करता हूँ। मेरा प्रभाव देखो। जिसके कारण तुम्हें दुःख हुआ है, उस यज्ञको नष्ट करनेके लिये मैं जिस वीर पुरुषकी सृष्टि कर रहा हूँ' उसपर दृष्टिपात करो ॥ २८ ॥
इत्युक्त्वा भगवान् पत्नीमुमां प्राणैरपि प्रियाम् । सोऽसृजद् भगवान् वक्त्राद् भूतं घोरं प्रहर्षणम् ॥ २९ ॥ अपने प्राणोंसे भी अधिक प्यारी पत्नी उमासे ऐसी बात कहकर भगवान् महेश्वरने अपने मुखसे एक अद्भुत एवं भयंकर प्राणीको प्रकट किया, जो उनका हर्ष बढ़ानेवाला था ॥ २९ ॥
तमुवाचाक्षिप मखं दक्षस्येति महेश्वरः । ततो वक्त्राद् विमुक्तेन सिंहेनैकेन लीलया ॥ ३० ॥ देव्या मन्युव्यपोहार्थं हतो दक्षस्य वै क्रतुः । महेश्वरने उस पुरुषको आज्ञा दी—'वीर! तुम दक्षके यज्ञका नाश कर दो।' फिर तो भगवान्के मुखसे निकले हुए उस सिंहके समान पराक्रमी एक ही वीरने पार्वतीदेवीके दुःख और क्रोधका निवारण करनेके लिये खेलही खेलमें प्रजापति दक्षके उस यज्ञका विध्वंस कर डाला ॥ ३० १/२ ॥
मन्युना च महाभीमा महाकाली महेश्वरी ॥ ३१ ॥
आत्मनः कर्मसाक्षित्वे तेन सार्धं सहानुगा ।
उस समय भवानीके क्रोधसे प्रकट हुई अत्यन्त भयंकर रूपवाली महाकाली महेश्वरीने भी अपना पराक्रम दिखानेके लिये सेवकोंसहित उस वीरके साथ प्रस्थान किया था ।। ३१ १/३ ।।
देवस्यानुमतं मत्वा प्रणम्य शिरसा ततः ॥ ३२ ॥
आत्मनः सदृशः शौर्याद् बलरूपसमन्वितः ।
स एव भगवान् क्रोधः प्रतिरूपसमन्वितः ॥ ३३ ॥
अनन्तबलवीर्यश्च अनन्तबलपौरुषः ।
वीरभद्र इति ख्यातो देव्या मन्युप्रमार्जकः ॥ ३४ ॥
(वीरभद्रने किस प्रकार उस यज्ञका विध्वंस किया, यह प्रसंग आगे बताया जाता है—) महादेवजीकी अनुमति जानकर उसने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। वह वीर अपने ही समान शौर्य, रूप और बलसे सम्पन्न था (उसकी कहीं उपमा नहीं थी)। भगवान् शिवका वह सब कुछ करनेमें समर्थ क्रोध ही मूर्तिमान् होकर उस वीरके रूपमें प्रकट हुआ था। उसके बल, वीर्य, शक्ति और पुरुषार्थका कहीं अन्त नहीं था। पार्वतीदेवीके क्रोध और खेदका निवारण करनेवाला वह पुरुष वीरभद्रके नामसे विख्यात हुआ ।। ३२—३४ ।।
सोऽसृजद् रोमकूपेभ्यो रौम्यान् नाम गणेश्वरान् ।
रुद्रतुल्या गणा रौद्रा रुद्रवीर्यपराक्रमाः ॥ ३५ ॥
उसने अपने रोमकूपोंसे सैन्य नामवाले गणेश्वरोंको प्रकट किया, जो रुद्रके समान ही होनेके कारण रौद्रगण कहलाये। उन सबके बल-पराक्रम भी रुद्रके ही समान थे ।। ३५ ।।
ते निपेतुरतस्तूर्णं दक्षयज्ञविहिंसया ।
भीमरूपा महाकायाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ३६ ॥
ततः किलकिलाशब्दैराकाशं पूरयन्निव ।
वे भयंकर रूपधारी विशालकाय रुद्रगण सैकड़ों और हजारोंकी टोलियाँ बनाकर अपनी किलकारियोंसे आकाशको गुँजाते हुए-से दक्षयज्ञका विध्वंस करनेके लिये बड़ी तेजीके साथ टूट पड़े ।। ३६ १/३ ।।
तेन शब्देन महता त्रस्तास्तत्र दिवौकसः ॥ ३७ ॥
पर्वताश्च व्यशीर्यन्त चकम्पे च वसुंधरा ।
मारुताश्चैव घूर्णन्ते चुक्षुभे वरुणालयः ॥ ३८ ॥
उस महाभयंकर कोलाहलसे उस यज्ञमें पधारे हुए समस्त देवता व्याकुल हो उठे। पर्वत टूक-टूक होकर बिखर गये। धरती डोलने लगी, आँधी चलने लगी और समुद्रमें तूफान आ गया ।। ३७-३८ ।।
अग्नयो नैव दीप्यन्ते नैव दीप्यति भास्करः ।
ग्रहा नैव प्रकाशन्ते नक्षत्राणि न चन्द्रमाः ॥ ३९ ॥
ऋषयो न प्रकाशन्ते न देवा न च मानुषाः ।
एवं तु तिमिरीभूते निर्दहन्त्यपमानिताः ।। ४० ।।
उस समय आग नहीं जलती थी, सूर्यका प्रकाश फीका पड़ गया; ग्रह, नक्षत्र और
चन्द्रमा भी निस्तेज हो गये। इस प्रकार वहाँ चारों ओर अँधेरा छा गया। देवता, ऋषि और
मनुष्य—सभी छिप गये—कोई दिखायी नहीं देते थे। दक्षसे अपमानित हुए रुद्रगण
यज्ञशालामें सब ओर आग लगाने लगे ।। ३९-४० ।।
प्रहरन्त्यपरे घोरा यूपानुत्पाटयन्ति च ।
प्रमर्दन्ति तथा चान्ये विमर्दन्ति तथा परे ।। ४१ ।।
दूसरे भयंकर भूत उसी यज्ञके सदस्योंको पीटने लगे। कुछ यूप उखाड़ने लगे। बहुतेरे
रुद्रगण यज्ञकी सामग्रीको कुचलने और रौंदने लगे ।। ४१ ।।
आधावन्ति प्रधावन्ति वायुवेगा मनोजवाः ।
चूर्णयन्ते यज्ञपात्राणि दिव्यान्याभरणानि च ।। ४२ ।।
वायु और मनके समान वेगशाली कितने ही पार्षद इधर-उधर दौड़ लगाने लगे। कुछ
लोग यज्ञके उपयोगमें आनेवाले पात्रों तथा दिव्य आभूषणोंको चूर-चूर कर रहे थे ।। ४२ ।।
विशीर्यमाणा दृश्यन्ते तारा इव नभस्तले ।
दिव्यान्नपानभक्ष्याणां राशयः पर्वतोपमाः ।। ४३ ।।
उनके बिखरकर गिरते हुए टुकड़े आकाशमें छिटके हुए तारोंके समान दिखायी देते थे।
उस यज्ञभूमिमें जहाँ-तहाँ दिव्य अन्न, पान और भक्ष्य पदार्थोंके पर्वतों-जैसे ढेर दिखायी देते
थे ।। ४३ ।।
क्षीरनद्योऽथ दृश्यते घृतपायसकर्दमाः ।
दधिमण्डोदका दिव्याः खण्डशर्करवालुकाः ।। ४४ ।।
दूधकी दिव्य नदियाँ वहाँ बहती दीखती थीं, घी और खीरकी कीच जम गयी थी, दही
और मट्ठा पानीकी तरह बह रहे थे तथा खाँड़ और शक्कर वहाँ बालूकी भाँति बिछ गये
थे ।। ४४ ।।
षड् रसान् निवहन्त्येता गुडकुल्या मनोरमाः ।
उच्चावचानि मांसानि भक्ष्याणि विविधानि च ।। ४५ ।।
ये सब नदियाँ षड्रस भोजन प्रवाहित कर रही थीं। गुड़के रसकी छोटी-छोटी मनोरम
नहरें दृष्टिगोचर होती थीं। नाना प्रकारके फलोंके गूदे और भाँति-भाँतिके भक्ष्य-पदार्थ
प्रस्तुत किये गये थे ।। ४५ ।।
पानकानि च दिव्यानि लेह्यचोष्याणि यानि च ।
भुञ्जते विविधैर्वक्त्रैर्विलम्पन्त्याक्षिपन्ति च ।। ४६ ।।
दिव्य पेय पदार्थ, लेह्य और चोष्य आदि जो-जो भोजन वहाँ उपलब्ध हुए, उन सबको
वे रुद्रगण अपने विविध मुखोंद्वारा खाने, नष्ट करने और चारों ओर छींटने तथा फेंकने
लगे ॥ ४६ ॥ रुद्रकोपान्महाकायाः कालाग्निसदृशोपमाः । क्षोभयन् सुरसैन्यानि भीषयन्तः समन्ततः ॥ ४७ ॥ वे विशालकाय भूत रुद्रदेवके क्रोधसे कालाग्निके समान होकर देवताओंकी सेनाओंको चारों ओरसे डराने और क्षुब्ध करने लगे ॥ ४७ ॥ क्रीडन्ति विविधाकाराश्चिक्षिपुः सुरयोषितः । रुद्रक्रोधात् प्रयत्नेन सर्वदेवैः सुरक्षितम् ॥ ४८ ॥ तं यज्ञमदहच्छीघ्रं रुद्रकर्मा समन्ततः । अनेक प्रकारकी आकृतिवाले वे रुद्रगण खेलते-कूदते और देवांगनाओंको दूर फेंक देते थे। यद्यपि सम्पूर्ण देवताओंने मिलकर प्रयत्नपूर्वक उस यज्ञकी रक्षा की थी तथापि रुद्रकर्मा वीरभद्रने रुद्रदेवके क्रोधसे प्रेरित हो सब ओरसे शीघ्र ही उसे जलाकर भस्म कर दिया ॥ ४८ १/२ ॥ चकार भैरवं नादं सर्वभूतभयंकरम् ॥ ४९ ॥ छित्त्वा शिरो वै यज्ञस्य ननाद च मुमोद च । तत्पश्चात् उसने ऐसी भीषण गर्जना की, जो समस्त प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाली थी। फिर उसने यज्ञका सिर काटकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया और मन-ही-मन आनन्दका अनुभव किया ॥ ४९ १/२ ॥ ततो ब्रह्मादयो देवा दक्षश्चैव प्रजापतिः ॥ ५० ॥ ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे कथ्यतां को भवानिति । तब ब्रह्मा आदि देवता तथा प्रजापति दक्ष—ये सब के-सब हाथ जोड़कर बोले—‘देवदेव! कहिये, आप कौन हैं?’ ॥ ५० १/२ ॥
वीरभद्र उवाच
नाहं रुद्रो न वा देवी नैव भोक्तुमिहागतः ॥ ५१ ॥ देव्या मन्युकृतं मत्वा क्रुद्धः सर्वात्मकः प्रभुः । **वीरभद्रने कहा—**ब्रह्मन्! मैं न तो रुद्र हूँ, न देवी हूँ और न यहाँ भोजन करनेके लिये ही आया हूँ। तुम्हारा यह यज्ञ देवी पार्वतीके रोषका कारण बन गया है—ऐसा जानकर सर्वात्मा भगवान् शिव कुपित हो उठे हैं ॥ ५१ १/२ ॥ द्रष्टुं वा नैव विप्रेन्द्रान् नैव कौतूहलेन वा ॥ ५२ ॥ तव यज्ञविघातार्थं सम्प्राप्तं विद्धि मामिह । मैं यहाँ आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका दर्शन करने या कौतूहलवश इस यज्ञका तमाशा देखनेके लिये नहीं आया हूँ। तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि मैं तुम्हारे इस यज्ञका विनाश करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ ॥
वीरभद्र इति ख्यातो रुद्रकोपाद् विनिःसृतः ॥ ५३ ॥ भद्रकालीति विख्याता देव्याः कोपाद् विनिःसृता । प्रेषितौ देवदेवेन यज्ञान्तिकमिहागतौ ॥ ५४ ॥ मेरा नाम वीरभद्र है। रुद्रदेवके क्रोधसे मेरा प्राकट्य हुआ है। यह नारी भद्रकालीके नामसे विख्यात है और देवी पार्वतीके कोपसे प्रकट हुई है। देवाधिदेव महादेवने हम दोनोंको यहाँ भेजा है। इसलिये हम दोनों इस यज्ञके निकट आये हैं॥ ५३-५४ ॥ शरणं गच्छ विप्रेन्द्र देवदेवमुमापतिम् । वरं क्रोधोऽपि देवस्य वरदानं न चान्यतः ॥ ५५ ॥ विप्रवर! तुम देवाधिदेव उमावल्लभ भगवान् शिवकी शरणमें जाओ। महादेवजीका क्रोध भी परम मंगलमय है और दूसरोंसे मिला हुआ वरदान भी मंगलकारक नहीं होता ॥ ५५ ॥ वीरभद्रवचः श्रुत्वा दक्षो धर्मभृतां वरः । तोषयामास स्तोत्रेण प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ ५६ ॥ वीरभद्रकी यह बात सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ दक्षने भगवान् शिवके उद्देश्यसे प्रणाम करके निम्नांकित स्तोत्रके द्वारा उनकी स्तुति की— ॥ ५६ ॥ प्रपद्ये देवमीशानं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् । महादेवं महात्मानं विश्वस्य जगतः पतिम् ॥ ५७ ॥ ‘जो सम्पूर्ण जगत्के शासक, पालक, महान् आत्मा, नित्य, सनातन, अविकारी और आराध्यदेव हैं, उन महादेवजीकी आज मैं शरण लेता हूँ’ ॥ ५७ ॥ प्राणापानौ संनिरुध्य वक्त्रस्थानेन यत्नतः । विचार्य सर्वतो दृष्टिं बहुदृष्टिरमित्रजित् ॥ ५८ ॥ सहसा देवदेवेशो ह्यग्निकुण्डात् समुत्थितः । बिभ्रत्सूर्यसहस्रस्य तेजः संवर्तकोपमः ॥ ५९ ॥ स्मितं कृत्वाब्रवीद् वाक्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । तब अनेक नेत्रोंवाले, शत्रुविजयी, महादेव अपने मुखोंद्वारा यत्नपूर्वक प्राण और अपान वायुको अवरुद्ध करके सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टिपात करते हुए सहसा अग्निकुण्डसे निकल पड़े। प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी स्वरूपसे सहस्रों सूर्योंकी प्रभा धारण किये वे दक्षके सामने खड़े हो गये और मुसकराकर बोले—‘प्रजापते! बोलो, मैं आज तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ’ ॥ ५८-५९ १/२ ॥ श्राविते च मखाध्याये देवानां गुरुणा ततः ॥ ६० ॥ तमुवाचाञ्जलिं कृत्वा दक्षो देवं प्रजापतिः । भीतशङ्कितवित्रस्तः सबाष्पवदनेक्षणः ॥ ६१ ॥ यदि प्रसन्नो भगवान् यदि चाहं भवत्प्रियः ।
यदि वाहमनुग्राह्यो यदि वा वरदो मम ॥ ६२ ॥
यद् दग्धं भक्षितं पीतमशितं यच्च नाशितम् ।
चूर्णीकृतापविद्धं च यज्ञसम्भारमीदृशम् ॥ ६३ ॥
दीर्घकालेन महता प्रयत्नेन सुसंचितम् ।
तन्न मिथ्या भवेन्मह्यं वरमेतमहं वृणे ॥ ६४ ॥
उस समय देवगुरु बृहस्पतिने महादेवजीको वेदका मखाध्याय पढ़कर सुनाया। तत्पश्चात् प्रजापति दक्ष दोनों नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए हाथ जोड़कर भय और शंकासे सहमे हुए-से बोले—'भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं, यदि मैं आपका प्रिय हूँ, आपके अनुग्रहका पात्र हूँ अथवा यदि आप मुझे वर देनेको उद्यत हैं तो मैं यही वर माँगता हूँ कि मैंने दीर्घकालसे महान् प्रयत्न करके जो ऐसा यज्ञ-सम्भार जुटा रखा था, उसमेंसे जो जला दिया गया, खा-पी लिया गया, नष्ट किया गया अथवा चूर-चूर करके फेंक दिया गया, वह सब मेरे लिये व्यर्थ न हो' ॥ ६०—६४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1858)
दक्षके यज्ञमें शिवजीका प्राकट्य
तथास्त्वित्याह भगवान् भगनेत्रहरो हरः ।
धर्माध्यक्षो विरूपाक्षस्त्र्यक्षो देवः प्रजापतिः ॥ ६५ ॥
तब धर्मके अध्यक्ष, प्रजापालक, विरूपाक्ष, त्रिनेत्रधारी, भगनेत्रहारी देवेश्वर भगवान्
हरने 'तथास्तु' कहकर दक्षको मनोवांछित वर दे दिया ॥ ६५ ॥
जानुभ्यामवनीं गत्वा दक्षो लब्ध्वा भवाद् वरम् ।
नाम्नामष्टसहस्रेण स्तुतवान् वृषभध्वजम् ॥ ६६ ॥
महादेवजीसे वर पाकर दक्षने धरतीपर घुटने टेककर उन्हें प्रणाम किया और एक
हजार आठ नामोंद्वारा उन भगवान् वृषभध्वजका स्तवन किया ॥ ६६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
यैर्नामधेयैः स्तुतवान् दक्षो देवं प्रजापतिः ।
वक्तुमर्हसि मे तात श्रोतुं श्रद्धा ममानघ ॥ ६७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—तात! निष्पाप पितामह! प्रजापति दक्षने जिन नामोंद्वारा
महादेवजीकी स्तुति की थी, उनका मुझसे वर्णन कीजिये। उन्हें सुननेके लिये मेरे हृदयमें
बड़ी श्रद्धा है ॥ ६७ ॥
भीष्म उवाच
श्रूयतां देवदेवस्य नामान्यद्भुतकर्मणः ।
गूढव्रतस्य गुह्यानि प्रकाशानि च भारत ॥ ६८ ॥
भीष्मजी कहते हैं—भरतनन्दन! अद्भुत कर्म करनेवाले गूढ व्रतधारी देवाधिदेव
महादेवजीके कुछ नाम गोपनीय हैं और कुछ प्रकाशित हैं। तुम उन सबको सुनो ॥ ६८ ॥
नमस्ते देवदेवेश देवारिबलसूदन ।
देवेन्द्रबलविष्टम्भ देवदानवपूजित ॥ ६९ ॥
(दक्ष बोले)—देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। आप देववैरी दानवोंकी सेनाके संहारक
और देवराज इन्द्रकी शक्तिको भी स्तम्भित करनेवाले हैं। देवता और दानव—सबने आपकी
पूजा की है ॥ ६९ ॥
सहस्राक्ष विरूपाक्ष त्र्यक्ष यक्षाधिपप्रिय ।
सर्वतःपाणिपादान्त सर्वतोऽक्षिशिरोमुख ॥ ७० ॥
आप सहस्रों नेत्रोंसे युक्त होनेके कारण सहस्राक्ष हैं। आपकी इन्द्रियाँ सबसे विलक्षण
अर्थात् परोक्ष विषयको भी प्रत्यक्ष करनेवाली हैं, इसलिये आपको विरूपाक्ष कहते हैं। आप
त्रिनेत्रधारी होनेके कारण त्र्यक्ष कहलाते हैं। यक्षराज कुबेरके भी आप प्रिय (इष्टदेव) हैं।
आपके सब ओर हाथ और पैर हैं तथा सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं ॥ ७० ॥
सर्वतःश्रुतिमँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि ।
शंकुकर्ण महाकर्ण कुम्भकर्णार्णवालय ॥ ७१ ॥
गजेन्द्रकर्ण गोकर्ण पाणिकर्ण नमोऽस्तु ते ।
आपके कान भी सब ओर हैं। संसारमें जो कुछ है, सबको व्याप्त करके आप स्थित हैं।
शंकुकर्ण, महाकर्ण, कुम्भकर्ण, अर्णवालय, गजेन्द्रकर्ण, गोकर्ण और पाणिकर्ण—ये सात
पार्षद आपके ही स्वरूप हैं। इन सबके रूपमें आपको नमस्कार है ।। ७१ १/२ ।।
शतोदर शतावर्त शतजिह्व नमोऽस्तु ते ।। ७२ ।।
गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः ।
ब्रह्माणं त्वा शतक्रतुमूर्ध्वं खमिव मेनिरे ।। ७३ ।।
आपके सैकड़ों उदर, सैकड़ों आवर्त और सैकड़ों जिह्वाएँ होनेके कारण आप क्रमशः
शतोदर, शतावर्त और शतजिह्व नामसे प्रसिद्ध हैं। आपको प्रणाम है। गायत्री-मन्त्रका जप
करनेवाले द्विज आपकी ही महिमाका गान करते हैं और सूर्योपासक सूर्यके रूपमें आपकी
ही आराधना करते हैं। ऋषिगण आपको ही ब्रह्मा, शतक्रतु इन्द्र और आकाशके समान
सर्वोच्च पद मानते हैं ।।
मूर्ती हि ते महामूर्ते समुद्राम्बरसंनिभ ।
सर्वा वै देवता ह्यस्मिन् गावो गोष्ठ इवासते ।। ७४ ।।
समुद्र और आकाशके समान अपार, अनन्त रूप धारण करनेवाले महामूर्तिधारी
महेश्वर! जैसे गोशालामें गौएँ निवास करती हैं, उसी प्रकार आपकी भूमि, जल, वायु, अग्नि,
आकाश, सूर्य, चन्द्रमा एवं यजमानरूप आठ प्रकारकी मूर्तियोंमें सम्पूर्ण देवताओंका
निवास है ।।
भवच्छरीरे पश्यामि सोममग्निं जलेश्वरम् ।
आदित्यमथ वै विष्णुं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम् ।। ७५ ।।
मैं आपके शरीरमें सोम, अग्नि, वरुण, सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा तथा बृहस्पतिको भी देख रहा
हूँ ।। ७५ ।।
भगवान् कारणं कार्यं क्रिया करणमेव च ।
असतश्च सतश्चैव तथैव प्रभवाप्ययौ ।। ७६ ।।
आप ही कारण, कार्य, क्रिया (प्रयत्न) और करण हैं। सत् और असत् पदार्थोंकी
उत्पत्ति और प्रलयके स्थान भी आप ही हैं ।। ७६ ।।
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च ।
पशूनां पतये नित्यं नमोऽस्त्वन्धकघातिने ।। ७७ ।।
आप सबके उद्भवका स्थान होनेसे भव, संहार करनेके कारण शर्व, 'रु' अर्थात् पाप
एवं दुःखको दूर करनेसे रुद्र, वरदाता होनेसे वरद तथा पशुओं (जीवों) के पालक होनेके
कारण सदा पशुपति कहलाते हैं। आपने ही अन्धकासुरका वध किया है, इसलिये आपका
नाम अन्धकघाती है। आपको बारंबार नमस्कार है ।। ७७ ।।
त्रिजटाय त्रिशीर्षाय त्रिशूलवरपाणिने ।
त्र्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरघ्नाय वै नमः ॥ ७८ ॥
आप तीन जटा और तीन मस्तक धारण करनेवाले हैं। आपके हाथमें श्रेष्ठ त्रिशूल शोभा पाता है। आप त्र्यम्बक, त्रिनेत्रधारी तथा त्रिपुरासुरका विनाश करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ ७८ ॥
नमश्चण्डाय कुण्डाय अण्डायाण्डधराय च ।
दण्डिने समकर्णाय दण्डिमुण्डाय वै नमः ॥ ७९ ॥
आप दुष्टोंपर अत्यन्त क्रोध करनेके कारण चण्ड हैं। कुण्डमें जलकी भाँति आपके उदरमें सम्पूर्ण जगत् स्थित है, इसलिये आपको कुण्ड कहते हैं। आप अण्ड (ब्रह्माण्ड स्वरूप) और अण्डधर (ब्रह्माण्डको धारण करनेवाले) हैं। आप दण्डधारी (सबको दण्ड देनेवाले) और समकर्ण (सबकी समान रूपसे सुननेवाले) हैं। दण्डधारण करके मूँड़ मुँड़ानेवाले संन्यासी भी आपके ही स्वरूप हैं, इसलिये आपका नाम दण्डिमुण्ड है। आपको नमस्कार है ॥ ७९ ॥
नमोर्ध्वदंष्ट्रकेशाय शुक्लायावतताय च ।
विलोहिताय धूम्राय नीलग्रीवाय वै नमः ॥ ८० ॥
आपकी दाढें बड़ी-बड़ी और सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए हैं, इसलिये आप ऊर्ध्वदंष्ट्र तथा ऊर्ध्वकेश कहलाते हैं। आप ही शुक्ल (विशुद्ध ब्रह्म) और आप ही अवतत (जगत्के रूपमें विस्तृत) हैं। आप रजोगुणको अपनानेपर विलोहित और तमोगुणका आश्रय लेनेपर धूम्र कहलाते हैं। आपकी ग्रीवामें नीले रंगका चिह्न है, इसलिये आपको नीलग्रीव कहते हैं। आपको नमस्कार है ॥ ८० ॥
नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च ।
सूर्याय सूर्यमालाय सूर्यध्वजपताकिने ॥ ८१ ॥
आपके रूपकी कहीं भी समता नहीं है, इसलिये आप अप्रतिरूप हैं। विविध रूप धारण करनेके कारण आपका नाम विरूप है। आप ही परम कल्याणकारी शिव हैं। आप ही सूर्य हैं, आप ही सूर्यमण्डलके भीतर सुशोभित होते हैं। आप अपनी ध्वजा और पताकापर सूर्यका चिह्न धारण करते हैं। आपको नमस्कार है ॥
नमः प्रमथनाथाय वृषस्कन्धाय धन्विने ।
शत्रुंदमाय दण्डाय पर्णचीरपटाय च ॥ ८२ ॥
आप प्रमथगणोंके अधीश्वर हैं। वृषभके कंधोंके समान आपके कंधे भरे हुए हैं। आप पिनाक धनुष धारण करते हैं। शत्रुओंका दमन करनेवाले और दण्डस्वरूप हैं। किरात या तपस्वीके रूपमें विचरते समय आप भोजपत्र और वल्कलवस्त्र धारण करते हैं। आपको नमस्कार है ॥
नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यकवचाय च ।
हिरण्यकृतचूड़ाय हिरण्यपतये नमः ॥ ८३ ॥
हिरण्य (सुवर्ण) को उत्पन्न करनेके कारण हिरण्यगर्भ कहलाते हैं। सुवर्णके ही कवच और मुकुट धारण करनेसे आपको हिरण्यकवच और हिरण्यचूड कहा गया है। आप सुवर्णके अधिपति हैं। आपको सादर नमस्कार है ॥ ८३ ॥ नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तूयमानाय वै नमः । सर्वाय सर्वभक्षाय सर्वभूतान्तरात्मने ॥ ८४ ॥ जिनकी स्तुति हो चुकी है, वे आप हैं। जो स्तुतिके योग्य हैं, वे भी आप हैं और जिनकी स्तुति हो रही है, वे भी आप ही हैं। आप सर्वस्वरूप, सर्वभक्षी और सम्पूर्ण भूतोंके अन्तरात्मा हैं। आपको बारंबार नमस्कार है ॥ ८४ ॥ नमो होत्रेऽथ मन्त्राय शुक्लध्वजपताकिने । नमो नाभाय नाभ्याय नमः कटकटाय च ॥ ८५ ॥ आप ही होता और मन्त्र हैं। आपको नमस्कार है। आपकी ध्वजा और पताकाका रंग श्वेत है। आपको नमस्कार है। आप नाभ (नाभिमें सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाले), नाभ्य (संसार-चक्रके नाभि-स्थान) तथा कट-कट (आवरणके भी आवरण) हैं। आपको नमस्कार है ॥ ८५ ॥ नमोऽस्तु कृशनासाय कृशाङ्गाय कृशाय च । संहृष्टाय विहृष्टाय नमः किलकिलाय च ॥ ८६ ॥ आपकी नासिका कृश (पतली) है, इसलिये आप कृशनस कहलाते हैं। आपके अवयव कृश होनेसे आपको कृशांग तथा शरीर दुबला होनेसे कृश कहते हैं। आप अत्यन्त हर्षोल्लाससे परिपूर्ण, विशेष हर्षका अनुभव करनेवाले और हर्षकी किल-किल ध्वनि हैं। आपको नमस्कार है ॥ ८६ ॥ नमोऽस्तु शयमानाय शयितायोत्थिताय च । स्थिताय धावमानाय मुण्डाय जटिलाय च ॥ ८७ ॥ आप समस्त प्राणियोंके भीतर शयन करनेवाले अन्तर्यामी पुरुष हैं। प्रलयकालमें योगनिद्राका आश्रय लेकर सोते और सृष्टिके प्रारम्भकालमें कल्पान्त निद्रासे जागते हैं। आप ब्रह्मरूपसे सर्वत्र स्थित और कालरूपसे सदा दौड़नेवाले हैं। मूँड मुँड़ानेवाले संन्यासी और जटाधारी तपस्वी भी आपके ही स्वरूप हैं। आपको नमस्कार है ॥ ८७ ॥ नमो नर्तनशीलाय मुखवादित्रवादिने । नाद्योपहारलुब्धाय गतिवादित्रशालिने ॥ ८८ ॥ आपका ताण्डव-नृत्य बराबर चलता रहता है। आप मुखसे शृंगी आदि बाजे बजानेमें कुशल हैं। कमलपुष्पकी भेंट लेनेके लिये सदा उत्सुक रहते हैं। गाने और बजानेकी कलामें तत्पर रहकर आप बड़ी शोभा पाते हैं। आपको प्रणाम है ॥ ८८ ॥ नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय बलप्रमथनाय च । कालनाथाय कल्याय क्षयायोपक्षयाय च ॥ ८९ ॥
आप अवस्थामें सबसे ज्येष्ठ और गुणोंमें भी सबसे श्रेष्ठ हैं। आपने बल नामक दैत्यको इन्द्ररूपसे मथ डाला था। आप कालके भी नियन्ता और सर्वशक्तिमान् हैं। महाप्रलय और अवान्तर-प्रलय भी आप ही हैं। आपको नमस्कार है ॥ ८९ ॥
भीमदुन्दुभिहासाय भीमव्रतधराय च।
उग्राय च नमो नित्यं नमोऽस्तु दशबाहवे ॥ ९० ॥
प्रभो! आपका अट्टहास भयंकर शब्द करनेवाली दुन्दुभिके समान जान पड़ता है। आप भीषण व्रतको धारण करनेवाले हैं। दस भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले उग्ररूपधारी आपको मेरा नित्य बारंबार नमस्कार है ॥
नमःकपालहस्ताय चितिभस्मप्रियाय च।
विभीषणाय भीष्माय भीमव्रतधराय च ॥ ९१ ॥
आपके हाथमें कपाल है। चिताका भस्म आपको बहुत प्रिय है। आप सबको भयभीत करनेवाले और स्वयं निर्भय हैं तथा शम-दम आदि तीक्ष्ण व्रतोंको धारण करते हैं। आपको नमस्कार है ॥ ९१ ॥
नमो विकृतवक्त्राय खड्गजिह्वाय दंष्ट्रिणे।
पक्वाममांसलुब्धाय तुम्बीवीणाप्रियाय च ॥ ९२ ॥
आपका मुख विकृत है। जिह्वा खड्गके समान है। आपका मुख दाढ़ोंसे सुशोभित होता है। आप कच्चे-पक्के फलोंके गूदेके लिये लुभायमान रहते हैं। तुम्बी और वीणा आपको विशेष प्रिय हैं। आपको प्रणाम है ॥
नमो वृषाय वृष्याय गोवृषाय वृषाय च।
कटंकटाय दण्डाय नमः पचपचाय च ॥ ९३ ॥
आप वृष (वृष्टिकर्ता), वृष्य (धर्मकी वृद्धि करनेवाले), गोवृष (नन्दी) और वृष (धर्म) आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। कटंकट (नित्य गतिशील), दण्ड (शासक) और पचपच (सम्पूर्ण भूतोंको पचानेवाला काल) भी आपके ही नाम हैं। आपको नमस्कार है ॥
नमः सर्ववरिष्ठाय वराय वरदाय च।
वरमाल्यगन्धवस्त्राय वरातिवरदे नमः ॥ ९४ ॥
आप सबसे श्रेष्ठ वरस्वरूप और वरदाता हैं। उत्तम वस्त्र, माल्य और गन्ध धारण करते हैं तथा भक्तको इच्छानुसार एवं उससे भी अधिक वर देनेवाले हैं। आपको प्रणाम है ॥ ९४ ॥
नमो रक्तविरक्ताय भावनायाक्षमालिने।
सम्भिन्नाय विभिन्नाय छायायातपनाय च ॥ ९५ ॥
रागी और विरागी—दोनों जिनके स्वरूप हैं, जो ध्यानपरायण, रुद्राक्षकी माला धारण करनेवाले, कारण-रूपसे सबमें व्याप्त और कार्यरूपसे पृथक्-पृथक् दिखायी देनेवाले हैं
तथा जो सम्पूर्ण जगत्को छाया और धूप प्रदान करते हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है॥ अघोरघोररूपाय घोरघोरतराय च। नमः शिवाय शान्ताय नमः शान्ततमाय च॥ ९६ ॥ जो अघोर, घोर और घोरसे भी घोरतर रूप धारण करनेवाले हैं तथा जो शिव, शान्त एवं परमशान्तरूप हैं, उन भगवान् शंकरको मेरा बारंबार नमस्कार है॥ ९६ ॥ एकपादबहुनेत्राय एकशीर्ष्णे नमोऽस्तु ते। रुद्राय क्षुद्रलुब्धाय संविभागप्रियाय च॥ ९७॥ एक पाद, अनेक नेत्र और एक मस्तकवाले आपको प्रणाम है। भक्तोंकी दी हुई छोटी-से-छोटी वस्तुके लिये भी लालायित रहनेवाले और उसके बदलेमें उन्हें अपार धनराशि बाँट देनेकी रुचि रखनेवाले आप भगवान् रुद्रको नमस्कार है॥ ९७॥ पञ्चालाय सिताङ्गाय नमः शमशमाय च। नमश्चुण्डिकघण्टाय घण्टायाघण्टघण्टिने ॥ ९८ ॥ जो इस विश्वका निर्माण करनेवाले कारीगर, गौरवर्णके शरीरवाले तथा सदा शान्तरूपसे रहनेवाले हैं, जिनकी घण्टाध्वनि शत्रुओंको भयभीत कर देती है तथा जो स्वयं ही घण्टानाद और अनाहतध्वनिके रूपमें श्रवणगोचर होते हैं उन महेश्वरको प्रणाम है॥ ९८॥ सहस्राध्मातघण्टाय घण्टामालाप्रियाय च। प्राणघण्टाय गन्धाय नमः कलकलाय च॥ ९९ ॥ जिनके मन्दिरमें लगे हुए घण्टोंको सहस्रों आदमी बजाते हैं, घण्टोंकी माला जिन्हें प्रिय है, जिनके प्राण ही घण्टाके समान ध्वनि करते हैं, जो गन्ध और कोलाहलरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है॥ हूँहूँहूंकारपाराय हूंहूंकारप्रियाय च। नमः शमशमे नित्यं गिरिवृक्षालयाय च॥ १०० ॥ आप हूं (क्रोध), हूं (हिंकार), हूं (आकाश, सूर्य और ईश्वर)—इन सबसे परे विद्यमान शान्तस्वरूप परब्रह्म हैं, ‘हूं’ ‘हूं’ करना आपको प्रिय लगता है, आप ‘शान्त रहो’ शान्त रहो’ ऐसा कहकर सदा सबको आश्वासन देनेवाले हैं तथा पर्वतोंपर और वृक्षोंके नीचे निवास करते हैं। आपको प्रणाम है॥ १००॥ गर्भमांससृगालाय तारकाय तराय च। नमो यज्ञाय यजिने हुताय प्रहुताय च॥ १०१ ॥ आप फलके भीतरके गूद्देरूप मांसके प्रलोभी शृगालरूप हैं। आप ही सबको तारनेवाले तथा तरण-तारणके साधन हैं। आप ही यज्ञ और आप ही यजमान हैं। आप ही हुत (हवन) और आप ही प्रहुत (अग्नि) हैं। आपको नमस्कार है॥ १०१॥
यज्ञवाहाय दान्ताय तप्यायातपनाय च । नमस्तटाय तट्याय तटानां पतये नमः ॥ १०२ ॥ आप ही यज्ञके निर्वाहक अथवा उसे सब देवताओं तक पहुँचानेवाले अग्निदेव हैं। आप मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं। आप ही भक्तोंका कष्ट देखकर संतप्त होनेवाले तथा शत्रुओंको संताप देनेवाले हैं। आप ही तट हैं। आप ही तटवर्ती नदी आदि हैं तथा आप ही तटोंके पालक हैं। आपको नमस्कार है ॥
अन्नदायान्नपतये नमस्त्वन्नभुजे तथा । नमः सहस्रशीर्षाय सहस्रचरणाय च ॥ १०३ ॥ आप ही अन्नदाता, अन्नपति और अन्नके भोक्ता हैं। आपके सहस्रों मस्तक और सहस्रों चरण हैं। आपको बारंबार प्रणाम है ॥ १०३ ॥
सहस्रोद्यतशूलाय सहस्रनयनाय च । नमो बालार्कवर्णाय बालरूपधराय च ॥ १०४ ॥ आप अपने सहस्रों हाथोंमें सहस्रों शूल लिये रहते हैं। आपके सहस्रों नेत्र हैं। आपकी अंगकान्ति प्रातःकालीन सूर्यके समान देदीप्यमान है। आप बालकरूप धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ १०४ ॥
बालानुचरगोप्ताय बालक्रीडनकाय च । नमो वृद्धाय लुब्धाय क्षुब्धाय क्षोभणाय च ॥ १०५ ॥ आप श्रीकृष्णरूपसे संगी-साथी बालकोंके रक्षक तथा बालकोंके साथ खेल करनेवाले हैं। आप सबकी अपेक्षा वृद्ध हैं। भक्ति और प्रेमके लोभी हैं। दुष्टोंके पापाचारसे क्षुब्ध हो उठते हैं और दुराचारियोंको क्षोभमें डालनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ १०५ ॥
तरङ्गाङ्कितकेशाय मुञ्जकेशाय वै नमः । नमः षट्कर्मतुष्टाय त्रिकर्मनिरताय च ॥ १०६ ॥ आपके केश गंगाके तरंगोंसे अंकित तथा मुञ्जके समान हैं। आपको नमस्कार है। आप ब्राह्मणोंके छः कर्म—अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन तथा दान और प्रतिग्रहसे संतुष्ट रहते हैं; स्वयं यजन, अध्ययन और दानरूप तीन कर्मोंमें ही तत्पर रहते हैं। आपको मेरा प्रणाम है ॥
वर्णाश्रमाणां विधिवत् पृथक्कर्मनिवर्तिने । नमो घुष्याय घोषाय नमः कलकलाय च ॥ १०७ ॥ आप वर्ण और आश्रमोंके भिन्न-भिन्न कर्मोंका विधिवत् विभाग करनेवाले, जपनीय मन्त्ररूप, घोषस्वरूप तथा कोलाहलमय हैं। आपको बारंबार नमस्कार है ॥
श्वेतपिङ्गलनेत्राय कृष्णरक्तेक्षणाय च । प्राणभग्नाय दण्डाय स्फोटनाय कृशाय च ॥ १०८ ॥
आपके नेत्र श्वेत पिङ्गलवर्णके हैं, काले और लाल रंगके हैं। आप प्राणवायु (श्वास)को जीतनेवाले, दण्ड (आयुध) रूप, ब्रह्माण्डरूपी घटको फोड़नेवाले तथा कृश-शरीरधारी हैं। आपको नमस्कार है ।। १०८ ।।
धर्मकामार्थमोक्षाणां कथनीयकथाय च । सांख्याय सांख्यमुख्याय सांख्ययोगप्रवर्तिने ।। १०९ ।। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष देनेके विषयमें आपकी कीर्तिकथा वर्णन करनेके योग्य है। आप सांख्यस्वरूप, सांख्ययोगियोंमें प्रधान तथा सांख्यशास्त्रको प्रवृत्त करनेवाले हैं। आपको प्रणाम है ।। १०९ ।।
नमो रथ्यविरथ्याय चतुष्पथरथाय च । कृष्णाजिनोत्तरीयाय व्यालयज्ञोपवीतिने ।। ११० ।। आप रथपर बैठकर तथा बिना रथके भी घूमनेवाले हैं। जल, अग्नि, वायु तथा आकाश—इन चारों मार्गोंपर आपकी गति है। आप काले मृगचर्मको दुपट्टेकी भाँति ओढ़नेवाले तथा सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करनेवाले हैं। आपको प्रणाम है ।। ११० ।।
ईशान वज्रसंघात हरिकेश नमोऽस्तु ते । त्र्यम्बकाम्बिकानाथाय व्यक्ताव्यक्त नमोऽस्तु ते ।। १११ ।। ईशान! आपका शरीर वज्रके समान कठोर है। हरिकेश! आपको नमस्कार है। व्यक्ताव्यक्तस्वरूप परमेश्वर! आप त्रिनेत्रधारी तथा अम्बिकाके स्वामी हैं। आपको नमस्कार है ।। १११ ।।
काम कामद कामघ्न तृप्तातृप्तविचारिणे । सर्व सर्वद सर्वघ्न संध्याराग नमोऽस्तु ते ।। ११२ ।। आप कामस्वरूप, कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, कामदेवके नाशक, तृप्त और अतृप्तका विचार करनेवाले, सर्वस्वरूप, सब कुछ देनेवाले, सबके संहारक और संध्याकालके समान रंगवाले हैं। आपको प्रणाम है ।।
महाबल महाबाहो महासत्त्व महाद्युते । महामेघचयप्रख्य महाकाल नमोऽस्तु ते ।। ११३ ।। महाबल! महाबाहो! महासत्त्व! महाद्युते! आप महान् मेघोंकी घटाके समान रंगवाले महाकालस्वरूप हैं। आपको नमस्कार है ।। ११३ ।।
स्थूल जीर्णाङ्ग जटिले वल्कलाजिनधारिणे । दीप्तसूर्याग्निजटिले वल्कलाजिनवाससे । सहस्रसूर्यप्रतिम तपोनित्य नमोऽस्तु ते ।। ११४ ।। आपका श्रीविग्रह स्थूल और जीर्ण है। आप जटाधारी हैं। वल्कल और मृगचर्म धारण करते हैं। देदीप्यमान सूर्य और अग्निके समान ज्योतिर्मयी जटासे सुशोभित हैं। वल्कल और
मृगचर्म ही आपके वस्त्र हैं। आप सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशमान और सदा तपस्यामें संलग्न रहनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ ११४ ॥ उन्मादन शतावर्त गङ्गातोयार्द्रमूर्धज । चन्द्रावर्त युगावर्त मेघावर्त नमोऽस्तु ते ॥ ११५ ॥ आप जगत्को उन्माद (मोह)-में डालनेवाले हैं। आपके मस्तकपर गंगाजीकी सैकड़ों लहरें और भँवरें उठती रहती हैं। आपके केश सदा गंगाजलसे भीगे रहते हैं। आप चन्द्रमाको क्षय-वृद्धिके चक्करमें डालनेवाले हैं। आप ही युगोंकी पुनरावृत्ति करनेवाले और मेघोंके प्रवर्तक हैं। आपको नमस्कार है ॥ ११५ ॥ त्वमन्नमन्नभोक्ता च अन्नदोऽन्नभुगेव च । अन्नस्रष्टा च पक्ता च पक्वभुक्पवनोऽनलः ॥ ११६ ॥ आप ही अन्न, अन्नके भोक्ता, अन्नदाता, अन्नका पालन करनेवाले, अन्नस्रष्टा, पाचक, पक्वान्नभोजी, प्राणवायु तथा जठरानलरूप हैं ॥ ११६ ॥ जरायुजाण्डजाश्चैव स्वेदजाश्च तथोद्भिजः । त्वमेव देवदेवेश भूतग्रामश्चतुर्विधः ॥ ११७ ॥ देवदेवेश्वर! जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके प्राणिसमूह आप ही हैं ॥ चराचरस्य स्रष्टा त्वं प्रतिहर्ता तथैव च । त्वामाहुर्ब्रह्मविदुषो ब्रह्म ब्रह्मविदां वर ॥ ११८ ॥ ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! आप ही चराचर जीवोंकी सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं। ब्रह्मज्ञानी पुरुष आपहीको ब्रह्म कहते हैं ॥ ११८ ॥ मनसः परमा योनिः खं वायुर्ज्योतिषां निधिः । ऋक्सामानि तथोङ्कारमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिनः ॥ ११९ ॥ वेदवादी विद्वान् आपको ही मनका परम कारण, आकाश, वायु, तेजकी निधि, ऋक्, साम तथा ॐकार बताते हैं ॥ ११९ ॥ हायिहायिहुवाहायाहावुहायि तथाऽसकृत् । गायन्ति त्वां सुरश्रेष्ठ सामगा ब्रह्मवादिनः ॥ १२० ॥ सुरश्रेष्ठ! सामगान करनेवाले वेदवेत्ता पुरुष ‘हा ३ यि, हा ३ यि, हू ३ वा, हा ३ यि, हा ३ वु, हा ३ यि’ आदिका बारंबार उच्चारण करके निरन्तर आपकी ही महिमाका गान करते हैं ॥ १२० ॥ यजुर्मयो ऋङ्मयश्च त्वमाहुतिमयस्तथा । पठ्यसे स्तुतिभिश्चैव वेदोपनिषदां गणैः ॥ १२१ ॥ यजुर्वेद और ऋग्वेद आपके ही स्वरूप हैं। आप ही हविष्य हैं। वेदों और उपनिषदोंके समूह अपनी स्तुतियोंद्वारा आपकी ही महिमाका प्रतिपादन करते हैं ॥ १२१ ॥