महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1864, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथा जो सम्पूर्ण जगत्को छाया और धूप प्रदान करते हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है॥ अघोरघोररूपाय घोरघोरतराय च। नमः शिवाय शान्ताय नमः शान्ततमाय च॥ ९६ ॥ जो अघोर, घोर और घोरसे भी घोरतर रूप धारण करनेवाले हैं तथा जो शिव, शान्त एवं परमशान्तरूप हैं, उन भगवान् शंकरको मेरा बारंबार नमस्कार है॥ ९६ ॥ एकपादबहुनेत्राय एकशीर्ष्णे नमोऽस्तु ते। रुद्राय क्षुद्रलुब्धाय संविभागप्रियाय च॥ ९७॥ एक पाद, अनेक नेत्र और एक मस्तकवाले आपको प्रणाम है। भक्तोंकी दी हुई छोटी-से-छोटी वस्तुके लिये भी लालायित रहनेवाले और उसके बदलेमें उन्हें अपार धनराशि बाँट देनेकी रुचि रखनेवाले आप भगवान् रुद्रको नमस्कार है॥ ९७॥ पञ्चालाय सिताङ्गाय नमः शमशमाय च। नमश्चुण्डिकघण्टाय घण्टायाघण्टघण्टिने ॥ ९८ ॥ जो इस विश्वका निर्माण करनेवाले कारीगर, गौरवर्णके शरीरवाले तथा सदा शान्तरूपसे रहनेवाले हैं, जिनकी घण्टाध्वनि शत्रुओंको भयभीत कर देती है तथा जो स्वयं ही घण्टानाद और अनाहतध्वनिके रूपमें श्रवणगोचर होते हैं उन महेश्वरको प्रणाम है॥ ९८॥ सहस्राध्मातघण्टाय घण्टामालाप्रियाय च। प्राणघण्टाय गन्धाय नमः कलकलाय च॥ ९९ ॥ जिनके मन्दिरमें लगे हुए घण्टोंको सहस्रों आदमी बजाते हैं, घण्टोंकी माला जिन्हें प्रिय है, जिनके प्राण ही घण्टाके समान ध्वनि करते हैं, जो गन्ध और कोलाहलरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है॥ हूँहूँहूंकारपाराय हूंहूंकारप्रियाय च। नमः शमशमे नित्यं गिरिवृक्षालयाय च॥ १०० ॥ आप हूं (क्रोध), हूं (हिंकार), हूं (आकाश, सूर्य और ईश्वर)—इन सबसे परे विद्यमान शान्तस्वरूप परब्रह्म हैं, ‘हूं’ ‘हूं’ करना आपको प्रिय लगता है, आप ‘शान्त रहो’ शान्त रहो’ ऐसा कहकर सदा सबको आश्वासन देनेवाले हैं तथा पर्वतोंपर और वृक्षोंके नीचे निवास करते हैं। आपको प्रणाम है॥ १००॥ गर्भमांससृगालाय तारकाय तराय च। नमो यज्ञाय यजिने हुताय प्रहुताय च॥ १०१ ॥ आप फलके भीतरके गूद्देरूप मांसके प्रलोभी शृगालरूप हैं। आप ही सबको तारनेवाले तथा तरण-तारणके साधन हैं। आप ही यज्ञ और आप ही यजमान हैं। आप ही हुत (हवन) और आप ही प्रहुत (अग्नि) हैं। आपको नमस्कार है॥ १०१॥