महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1865, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयज्ञवाहाय दान्ताय तप्यायातपनाय च । नमस्तटाय तट्याय तटानां पतये नमः ॥ १०२ ॥ आप ही यज्ञके निर्वाहक अथवा उसे सब देवताओं तक पहुँचानेवाले अग्निदेव हैं। आप मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले हैं। आप ही भक्तोंका कष्ट देखकर संतप्त होनेवाले तथा शत्रुओंको संताप देनेवाले हैं। आप ही तट हैं। आप ही तटवर्ती नदी आदि हैं तथा आप ही तटोंके पालक हैं। आपको नमस्कार है ॥
अन्नदायान्नपतये नमस्त्वन्नभुजे तथा । नमः सहस्रशीर्षाय सहस्रचरणाय च ॥ १०३ ॥ आप ही अन्नदाता, अन्नपति और अन्नके भोक्ता हैं। आपके सहस्रों मस्तक और सहस्रों चरण हैं। आपको बारंबार प्रणाम है ॥ १०३ ॥
सहस्रोद्यतशूलाय सहस्रनयनाय च । नमो बालार्कवर्णाय बालरूपधराय च ॥ १०४ ॥ आप अपने सहस्रों हाथोंमें सहस्रों शूल लिये रहते हैं। आपके सहस्रों नेत्र हैं। आपकी अंगकान्ति प्रातःकालीन सूर्यके समान देदीप्यमान है। आप बालकरूप धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ १०४ ॥
बालानुचरगोप्ताय बालक्रीडनकाय च । नमो वृद्धाय लुब्धाय क्षुब्धाय क्षोभणाय च ॥ १०५ ॥ आप श्रीकृष्णरूपसे संगी-साथी बालकोंके रक्षक तथा बालकोंके साथ खेल करनेवाले हैं। आप सबकी अपेक्षा वृद्ध हैं। भक्ति और प्रेमके लोभी हैं। दुष्टोंके पापाचारसे क्षुब्ध हो उठते हैं और दुराचारियोंको क्षोभमें डालनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ १०५ ॥
तरङ्गाङ्कितकेशाय मुञ्जकेशाय वै नमः । नमः षट्कर्मतुष्टाय त्रिकर्मनिरताय च ॥ १०६ ॥ आपके केश गंगाके तरंगोंसे अंकित तथा मुञ्जके समान हैं। आपको नमस्कार है। आप ब्राह्मणोंके छः कर्म—अध्ययन-अध्यापन, यजन-याजन तथा दान और प्रतिग्रहसे संतुष्ट रहते हैं; स्वयं यजन, अध्ययन और दानरूप तीन कर्मोंमें ही तत्पर रहते हैं। आपको मेरा प्रणाम है ॥
वर्णाश्रमाणां विधिवत् पृथक्कर्मनिवर्तिने । नमो घुष्याय घोषाय नमः कलकलाय च ॥ १०७ ॥ आप वर्ण और आश्रमोंके भिन्न-भिन्न कर्मोंका विधिवत् विभाग करनेवाले, जपनीय मन्त्ररूप, घोषस्वरूप तथा कोलाहलमय हैं। आपको बारंबार नमस्कार है ॥
श्वेतपिङ्गलनेत्राय कृष्णरक्तेक्षणाय च । प्राणभग्नाय दण्डाय स्फोटनाय कृशाय च ॥ १०८ ॥