भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1867, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1867

मृगचर्म ही आपके वस्त्र हैं। आप सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशमान और सदा तपस्यामें संलग्न रहनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ॥ ११४ ॥ उन्मादन शतावर्त गङ्गातोयार्द्रमूर्धज । चन्द्रावर्त युगावर्त मेघावर्त नमोऽस्तु ते ॥ ११५ ॥ आप जगत्को उन्माद (मोह)-में डालनेवाले हैं। आपके मस्तकपर गंगाजीकी सैकड़ों लहरें और भँवरें उठती रहती हैं। आपके केश सदा गंगाजलसे भीगे रहते हैं। आप चन्द्रमाको क्षय-वृद्धिके चक्करमें डालनेवाले हैं। आप ही युगोंकी पुनरावृत्ति करनेवाले और मेघोंके प्रवर्तक हैं। आपको नमस्कार है ॥ ११५ ॥ त्वमन्नमन्नभोक्ता च अन्नदोऽन्नभुगेव च । अन्नस्रष्टा च पक्ता च पक्वभुक्पवनोऽनलः ॥ ११६ ॥ आप ही अन्न, अन्नके भोक्ता, अन्नदाता, अन्नका पालन करनेवाले, अन्नस्रष्टा, पाचक, पक्वान्नभोजी, प्राणवायु तथा जठरानलरूप हैं ॥ ११६ ॥ जरायुजाण्डजाश्चैव स्वेदजाश्च तथोद्भिजः । त्वमेव देवदेवेश भूतग्रामश्चतुर्विधः ॥ ११७ ॥ देवदेवेश्वर! जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज—ये चार प्रकारके प्राणिसमूह आप ही हैं ॥ चराचरस्य स्रष्टा त्वं प्रतिहर्ता तथैव च । त्वामाहुर्ब्रह्मविदुषो ब्रह्म ब्रह्मविदां वर ॥ ११८ ॥ ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ! आप ही चराचर जीवोंकी सृष्टि तथा संहार करनेवाले हैं। ब्रह्मज्ञानी पुरुष आपहीको ब्रह्म कहते हैं ॥ ११८ ॥ मनसः परमा योनिः खं वायुर्ज्योतिषां निधिः । ऋक्सामानि तथोङ्कारमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिनः ॥ ११९ ॥ वेदवादी विद्वान् आपको ही मनका परम कारण, आकाश, वायु, तेजकी निधि, ऋक्, साम तथा ॐकार बताते हैं ॥ ११९ ॥ हायिहायिहुवाहायाहावुहायि तथाऽसकृत् । गायन्ति त्वां सुरश्रेष्ठ सामगा ब्रह्मवादिनः ॥ १२० ॥ सुरश्रेष्ठ! सामगान करनेवाले वेदवेत्ता पुरुष ‘हा ३ यि, हा ३ यि, हू ३ वा, हा ३ यि, हा ३ वु, हा ३ यि’ आदिका बारंबार उच्चारण करके निरन्तर आपकी ही महिमाका गान करते हैं ॥ १२० ॥ यजुर्मयो ऋङ्मयश्च त्वमाहुतिमयस्तथा । पठ्यसे स्तुतिभिश्चैव वेदोपनिषदां गणैः ॥ १२१ ॥ यजुर्वेद और ऋग्वेद आपके ही स्वरूप हैं। आप ही हविष्य हैं। वेदों और उपनिषदोंके समूह अपनी स्तुतियोंद्वारा आपकी ही महिमाका प्रतिपादन करते हैं ॥ १२१ ॥