भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1868

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वर्णावराश्च ये ।
त्वमेव मेघसंघाश्च विद्युत्स्तनितगर्जितः ॥ १२२ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्त्यज—ये आपके ही स्वरूप हैं। मेघोंकी घटा, बिजली, गर्जना और गड़गड़ाहट भी आप ही हैं ॥ १२२ ॥
संवत्सरस्त्वमृतवो मासो मासार्धमेव च ।
युगं निमेषाः काष्ठास्त्वं नक्षत्राणि ग्रहाः कलाः ॥ १२३ ॥
संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, युग, निमेष, काष्ठा, नक्षत्र, ग्रह और कला भी आप ही हैं ॥ १२३ ॥
वृक्षाणां ककुदोऽसि त्वं गिरीणां शिखराणि च ।
व्याघ्रो मृगाणां पततां तार्क्ष्योऽनन्तश्च भोगिनाम् ॥ १२४ ॥
वृक्षोंमें प्रधान वट-पीपल आदि, पर्वतोंमें उनके शिखर, वन-जन्तुओंमें व्याघ्र, पक्षियोंमें गरुड़ तथा सर्पोंमें अनन्त आप ही हैं ॥ १२४ ॥
क्षीरोदो ह्युदधीनां च यन्त्राणां धनुरेव च ।
वज्रः प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च ॥ १२५ ॥
समुद्रोंमें क्षीरसागर, यन्त्रों (अस्त्रों)-में धनुष, चलाये जानेवाले आयुधोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य भी आप ही हैं ॥ १२५ ॥
त्वमेव द्वेष इच्छा च रागो मोहः क्षमाक्षमे ।
व्यवसायो धृतिर्लोभः कामक्रोधौ जयाजयौ ॥ १२६ ॥
आप ही द्वेष, इच्छा, राग, मोह, क्षमा, अक्षमा, व्यवसाय, धैर्य, लोभ, काम, क्रोध, जय तथा पराजय हैं ॥
त्वं गदी त्वं शरी चापी खट्वाङ्गी झर्झरी तथा ।
छेत्ता भेत्ता प्रहर्ता त्वं नेता मन्ता पिता मतः ॥ १२७ ॥
आप गदा, बाण, धनुष, खाटका अंग तथा झर्झर नामक अस्त्र धारण करनेवाले हैं। आप छेदन, भेदन और प्रहार करनेवाले हैं। सत्पथपर ले जानेवाले, शुभका मनन करनेवाले तथा पिता माने गये हैं ॥ १२७ ॥
दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोऽर्थः काम एव च ।
गङ्गा समुद्राः सरितः पल्वलानि सरांसि च ॥ १२८ ॥
लता वल्यस्तृणौषध्यः पशवो मृगपक्षिणः ।
द्रव्यकर्मसमारम्भः कालः पुष्पफलप्रदः ॥ १२९ ॥
दस लक्षणोंवाला धर्म तथा अर्थ और काम भी आप ही हैं। गंगा, समुद्र, नदियाँ, गड़हे, तालाब, लता, वल्ली, तृण, ओषधि, पशु, मृग, पक्षी, द्रव्य और कर्मोंके आरम्भ तथा फूल और फल देनेवाला काल भी आप ही हैं ॥ १२८-१२९ ॥
आदिश्चान्तश्च देवानां गायत्र्योंकार एव च ।