भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1869

हरितो रोहितो नीलः कृष्णो रक्तस्तथारुणः । कद्रुश्च कपिलश्चैव कपोतो मेचकस्तथा ॥ १३० ॥ आप देवताओंके आदि और अन्त हैं। गायत्री-मन्त्र और ॐकार भी आप ही हैं। हरित, लोहित, नील, कृष्ण, रक्त, अरुण, कद्रु, कपिल, कबूतरके समान तथा मेचक (श्याम मेघके समान)—ये दस प्रकारके रंग भी आपके ही स्वरूप हैं ॥ १३० ॥

अवर्णश्च सुवर्णश्च वर्णकारो घनोपमः । सुवर्णनामा च तथा सुवर्णप्रिय एव च ॥ १३१ ॥ आप वर्णरहित होनेके कारण अवर्ण और अच्छे वर्णवाले होनेसे सुवर्ण कहलाते हैं। आप वर्णोंके निर्माता और मेघके समान हैं। आपके नाममें सुन्दर वर्णों (अक्षरों)-का उपयोग हुआ है, इसलिये आप सुवर्णनामा हैं तथा आपको श्रेष्ठ वर्ण प्रिय है ॥ १३१ ॥

त्वमिन्द्रश्च यमश्चैव वरुणो धनदोऽनलः । उपप्लवश्चित्रभानुः स्वर्भानुर्भानुरेव च ॥ १३२ ॥ आप ही इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, अग्नि, सूर्य-चन्द्रका ग्रहण, चित्रभानु (सूर्य), राहु और भानु हैं ॥ १३२ ॥

होत्रं होता च होम्यं च हुतं चैव तथा प्रभुः । त्रिसौपर्णं तथा ब्रह्म यजुषां शतरुद्रियम् ॥ १३३ ॥ होत्र (स्रुवा), होता, हवनीय पदार्थ, हवन-क्रिया तथा (उसके फल देनेवाले) परमेश्वर भी आप ही हैं। वेदकी त्रिसौपर्ण नामक श्रुतियोंमें तथा यजुर्वेदके शतरुद्रिय-प्रकरणमें जो बहुत-से वैदिक नाम हैं, वे सब आपहीके नाम हैं ॥ १३३ ॥

पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मङ्गलम् । गिरिको हिंडुको वृक्षो जीवः पुद्गल एव च ॥ १३४ ॥ प्राणः सत्त्वं रजश्चैव तमश्चाप्रमदस्तथा । प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ॥ १३५ ॥ उन्मेषश्च निमेषश्च क्षुतं जृम्भितमेव च । लोहितान्तर्गता दृष्टिर्महावक्त्रो महोदरः ॥ १३६ ॥ आप पवित्रोंके भी पवित्र और मंगलोंके भी मंगल हैं। आप ही गिरिक (अचेतनको भी चेतन करनेवाले), हिंडुक (गमनागमन करनेवाले), संसार-वृक्ष, जीव, शरीर, प्राण, सत्त्व, रज, तम, अप्रमद (स्त्रीरहित—ऊर्ध्वरेता), प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, उन्मेष, निमेष (आँखोंका खोलना-मींचना), छींकना और जँभाई लेना आदि चेष्टाएँ भी आप ही हैं। आपकी अग्निमयी लाल रंगकी दृष्टि भीतर छिपी हुई है। आपके मुख और उदर महान् हैं ॥ १३४—१३६ ॥

सूचीरोमा हरिश्मश्रूरूर्ध्वकेशश्चलाचलः । गीतवादित्रतत्त्वज्ञो गीतवादनकप्रियः ॥ १३७ ॥