महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1870, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंरोएँ सूईके समान हैं। दाढ़ी-मूँछ काली है। सिरके बाल ऊपरकी ओर उठे हुए हैं। आप चराचर-स्वरूप हैं। गाने-बजानेके तत्त्वको जाननेवाले हैं। गाना-बजाना आपको अधिक प्रिय है ॥ १३७ ॥
मत्स्यो जलचरो जाल्योऽकलः कलिकलः कलिः । अकालश्चातिकालश्च दुष्कालः काल एव च ॥ १३८ ॥ आप मत्स्य, जलचर और जालधारी घड़ियाल हैं। फिर भी अकल (बन्धनसे परे) हैं। आप केलिकलासे युक्त और कलहरूप हैं। आपही अकाल, अतिकाल, दुष्काल तथा काल हैं ॥ १३८ ॥
मृत्युः क्षुरश्च कृत्यश्च पक्षोऽपक्षक्षयंकरः । मेघकालो महादंष्ट्रः संवर्तकबलाहकः ॥ १३९ ॥ मृत्यु, क्षुर (छेदन करनेका शस्त्र), कृत्य (छेदन करने योग्य), पक्ष (मित्र) तथा अपक्ष-क्षयंकर (शत्रुपक्षका नाश करनेवाले) भी आप ही हैं। आप मेघके समान काले, बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले और प्रलयकालीन मेघ हैं ॥ १३९ ॥
घण्टोऽघण्टो घटी घण्टी चरुचेली मिलीमिली । ब्रह्मकायिकमग्नीनां दण्डी मुण्डस्त्रिदण्डधृक् ॥ १४० ॥ घण्ट (प्रकाशवान्), अघण्ट (अव्यक्त प्रकाशवाले), घटी (कर्मफलसे युक्त करनेवाले), घण्टी (घण्टावाले), चरुचेली (जीवोंके साथ क्रीडा करनेवाले) तथा मिली-मिली (कारणरूपसे सबमें व्याप्त)—ये सब आप ही हैं। आप ही ब्रह्म, अग्नियोंके स्वरूप, दण्डी, मुण्ड तथा त्रिदण्डधारी हैं ॥ १४० ॥
चतुर्युगश्चतुर्वेदश्चातुर्होत्रप्रवर्तकः । चातुराश्रम्यनेता च चातुर्वर्ण्यकरश्च यः ॥ १४१ ॥ चार युग और चार वेद आपके ही स्वरूप हैं तथा चार प्रकारके होतृ-कर्मोंके प्रवर्तक आप ही हैं। आप चारों आश्रमोंके नेता तथा चारों वर्णोंकी सृष्टि करनेवाले हैं ॥ १४१ ॥
सदा चाक्षप्रियो धूर्तो गणाध्यक्षो गणाधिपः । रक्तमाल्याम्बरधरो गिरिशो गिरिकप्रियः ॥ १४२ ॥ आप ही अक्षप्रिय, धूर्त, गणाध्यक्ष और गणाधिप आदि नामोंसे प्रसिद्ध हैं। आप रक्त वस्त्र तथा लाल फूलोंकी माला पहनते हैं, पर्वतपर शयन करते और गेरुए वस्त्रसे प्रेम रखते हैं ॥ १४२ ॥
शिल्पिकः शिल्पिनां श्रेष्ठः सर्वशिल्पप्रवर्तकः । भगनेत्राङ्कुशश्चण्डः पूष्णो दन्तविनाशनः ॥ १४३ ॥ आप ही शिल्पियोंमें सर्वश्रेष्ठ शिल्पी (कारीगर) तथा सब प्रकारकी शिल्पकलाके प्रवर्तक हैं। आप भगदेवताकी आँख फोड़नेके लिये अंकुश, चण्ड (अत्यन्त कोप करनेवाले) और पूषाके दाँत नष्ट करनेवाले हैं ॥