महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1859, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथास्त्वित्याह भगवान् भगनेत्रहरो हरः ।
धर्माध्यक्षो विरूपाक्षस्त्र्यक्षो देवः प्रजापतिः ॥ ६५ ॥
तब धर्मके अध्यक्ष, प्रजापालक, विरूपाक्ष, त्रिनेत्रधारी, भगनेत्रहारी देवेश्वर भगवान्
हरने 'तथास्तु' कहकर दक्षको मनोवांछित वर दे दिया ॥ ६५ ॥
जानुभ्यामवनीं गत्वा दक्षो लब्ध्वा भवाद् वरम् ।
नाम्नामष्टसहस्रेण स्तुतवान् वृषभध्वजम् ॥ ६६ ॥
महादेवजीसे वर पाकर दक्षने धरतीपर घुटने टेककर उन्हें प्रणाम किया और एक
हजार आठ नामोंद्वारा उन भगवान् वृषभध्वजका स्तवन किया ॥ ६६ ॥
युधिष्ठिर उवाच
यैर्नामधेयैः स्तुतवान् दक्षो देवं प्रजापतिः ।
वक्तुमर्हसि मे तात श्रोतुं श्रद्धा ममानघ ॥ ६७ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—तात! निष्पाप पितामह! प्रजापति दक्षने जिन नामोंद्वारा
महादेवजीकी स्तुति की थी, उनका मुझसे वर्णन कीजिये। उन्हें सुननेके लिये मेरे हृदयमें
बड़ी श्रद्धा है ॥ ६७ ॥
भीष्म उवाच
श्रूयतां देवदेवस्य नामान्यद्भुतकर्मणः ।
गूढव्रतस्य गुह्यानि प्रकाशानि च भारत ॥ ६८ ॥
भीष्मजी कहते हैं—भरतनन्दन! अद्भुत कर्म करनेवाले गूढ व्रतधारी देवाधिदेव
महादेवजीके कुछ नाम गोपनीय हैं और कुछ प्रकाशित हैं। तुम उन सबको सुनो ॥ ६८ ॥
नमस्ते देवदेवेश देवारिबलसूदन ।
देवेन्द्रबलविष्टम्भ देवदानवपूजित ॥ ६९ ॥
(दक्ष बोले)—देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। आप देववैरी दानवोंकी सेनाके संहारक
और देवराज इन्द्रकी शक्तिको भी स्तम्भित करनेवाले हैं। देवता और दानव—सबने आपकी
पूजा की है ॥ ६९ ॥
सहस्राक्ष विरूपाक्ष त्र्यक्ष यक्षाधिपप्रिय ।
सर्वतःपाणिपादान्त सर्वतोऽक्षिशिरोमुख ॥ ७० ॥
आप सहस्रों नेत्रोंसे युक्त होनेके कारण सहस्राक्ष हैं। आपकी इन्द्रियाँ सबसे विलक्षण
अर्थात् परोक्ष विषयको भी प्रत्यक्ष करनेवाली हैं, इसलिये आपको विरूपाक्ष कहते हैं। आप
त्रिनेत्रधारी होनेके कारण त्र्यक्ष कहलाते हैं। यक्षराज कुबेरके भी आप प्रिय (इष्टदेव) हैं।
आपके सब ओर हाथ और पैर हैं तथा सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं ॥ ७० ॥
सर्वतःश्रुतिमँल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि ।
शंकुकर्ण महाकर्ण कुम्भकर्णार्णवालय ॥ ७१ ॥