महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1860, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंगजेन्द्रकर्ण गोकर्ण पाणिकर्ण नमोऽस्तु ते ।
आपके कान भी सब ओर हैं। संसारमें जो कुछ है, सबको व्याप्त करके आप स्थित हैं।
शंकुकर्ण, महाकर्ण, कुम्भकर्ण, अर्णवालय, गजेन्द्रकर्ण, गोकर्ण और पाणिकर्ण—ये सात
पार्षद आपके ही स्वरूप हैं। इन सबके रूपमें आपको नमस्कार है ।। ७१ १/२ ।।
शतोदर शतावर्त शतजिह्व नमोऽस्तु ते ।। ७२ ।।
गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः ।
ब्रह्माणं त्वा शतक्रतुमूर्ध्वं खमिव मेनिरे ।। ७३ ।।
आपके सैकड़ों उदर, सैकड़ों आवर्त और सैकड़ों जिह्वाएँ होनेके कारण आप क्रमशः
शतोदर, शतावर्त और शतजिह्व नामसे प्रसिद्ध हैं। आपको प्रणाम है। गायत्री-मन्त्रका जप
करनेवाले द्विज आपकी ही महिमाका गान करते हैं और सूर्योपासक सूर्यके रूपमें आपकी
ही आराधना करते हैं। ऋषिगण आपको ही ब्रह्मा, शतक्रतु इन्द्र और आकाशके समान
सर्वोच्च पद मानते हैं ।।
मूर्ती हि ते महामूर्ते समुद्राम्बरसंनिभ ।
सर्वा वै देवता ह्यस्मिन् गावो गोष्ठ इवासते ।। ७४ ।।
समुद्र और आकाशके समान अपार, अनन्त रूप धारण करनेवाले महामूर्तिधारी
महेश्वर! जैसे गोशालामें गौएँ निवास करती हैं, उसी प्रकार आपकी भूमि, जल, वायु, अग्नि,
आकाश, सूर्य, चन्द्रमा एवं यजमानरूप आठ प्रकारकी मूर्तियोंमें सम्पूर्ण देवताओंका
निवास है ।।
भवच्छरीरे पश्यामि सोममग्निं जलेश्वरम् ।
आदित्यमथ वै विष्णुं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम् ।। ७५ ।।
मैं आपके शरीरमें सोम, अग्नि, वरुण, सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा तथा बृहस्पतिको भी देख रहा
हूँ ।। ७५ ।।
भगवान् कारणं कार्यं क्रिया करणमेव च ।
असतश्च सतश्चैव तथैव प्रभवाप्ययौ ।। ७६ ।।
आप ही कारण, कार्य, क्रिया (प्रयत्न) और करण हैं। सत् और असत् पदार्थोंकी
उत्पत्ति और प्रलयके स्थान भी आप ही हैं ।। ७६ ।।
नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च ।
पशूनां पतये नित्यं नमोऽस्त्वन्धकघातिने ।। ७७ ।।
आप सबके उद्भवका स्थान होनेसे भव, संहार करनेके कारण शर्व, 'रु' अर्थात् पाप
एवं दुःखको दूर करनेसे रुद्र, वरदाता होनेसे वरद तथा पशुओं (जीवों) के पालक होनेके
कारण सदा पशुपति कहलाते हैं। आपने ही अन्धकासुरका वध किया है, इसलिये आपका
नाम अन्धकघाती है। आपको बारंबार नमस्कार है ।। ७७ ।।
त्रिजटाय त्रिशीर्षाय त्रिशूलवरपाणिने ।