भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1851

दक्ष उवाच

एतन्मखेशाय सुवर्णपात्रे हविः समस्तं विधिमन्त्रपूतम् । विष्णोर्नयाम्यप्रतिमस्य भागं प्रभुर्विभुश्चाहवनीय एषः ॥ २२ ॥ **दक्षने कहा—**महर्षे! देखो, विधिपूर्वक मन्त्रसे पवित्र की हुई यह सारी हवि सुवर्णके पात्रमें रखी हुई है। यह यज्ञेश्वर श्रीविष्णुको समर्पित है। भगवान् विष्णुकी कहीं समता नहीं है। मैं उन्हींको हविष्यका यह भाग अर्पित करूँगा। ये भगवान् विष्णु ही सर्वसमर्थ, व्यापक और यज्ञभाग अर्पित करनेके योग्य हैं ॥ २२ ॥

देव्युवाच

किं नाम दानं नियमं तपो वा कुर्यामहं येन पतिर्ममाद्य । लभेत भागं भगवानचिन्त्यो ह्यर्धं तथा भागमथो तृतीयम् ॥ २३ ॥ (दूसरी ओर कैलास पर्वतपर) पार्वती देवी (बहुत दुखी होकर) कह रही थीं—आह, मैं कौन-सा व्रत, दान या तप करूँ, जिसके प्रभावसे आज मेरे पतिदेव अचिन्त्य भगवान् शंकरको यज्ञका आधा अथवा तिहाई भाग अवश्य प्राप्त हो?' ॥ २३ ॥

एवं ब्रुवाणां भगवान् स पत्नीं प्रहृष्टरूपः क्षुभितामुवाच । न वेत्सि मां देवि कृशोदराङ्गि किं नाम युक्तं वचनं मखेशे ॥ २४ ॥ क्षोभमें भरकर इस प्रकार बोलती हुई पत्नीकी बात सुनकर भगवान् शंकर हर्षसे खिल उठे और इस प्रकार बोले—‘देवि! कृशोदराङ्गि! तू मुझे नहीं जानती, मैं सम्पूर्ण यज्ञोंका ईश्वर हूँ। मेरे विषयमें किस प्रकारके वचन कहना चाहिये, यह भी तुम नहीं जानती ॥ २४ ॥

अहं विजानामि विशालनेत्रे ध्यानेन हीना न विदन्त्यसन्तः । तवाद्य मोहेन च सेन्द्रदेवा लोकास्त्रयः सर्वत एव मूढाः ॥ २५ ॥ ‘पर मैं सब कुछ जानता हूँ। विशाललोचने! जिनका चित्त एकाग्र नहीं है, वे ध्यानशून्य असाधु पुरुष मेरे स्वरूपको नहीं जानते। आज तुम्हारे इस मोहसे इन्द्र आदि देवताओंसहित तीनों लोक सब ओरसे किंकर्तव्य-विमूढ हो गये हैं ॥ २५ ॥