महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1852, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमामध्वरे शंसितारः स्तुवन्ति रथन्तरं सामगाश्चोपगान्ति । मां ब्राह्मणा ब्रह्मविदो यजन्ते ममाध्वर्यवः कल्पयन्ते च भागम् ॥ २६ ॥ 'यज्ञमें प्रस्तोतालोग मेरी स्तुति करते हैं। सामगान करनेवाले ब्राह्मण रथन्तर सामके रूपमें मेरी ही महिमाका गान करते हैं। वेदवेत्ता विप्र मेरा ही यजन करते और ऋत्विज्लोग यज्ञमें मुझे ही भाग अर्पित करते हैं' ॥ २६ ॥
देव्युवाच
सुप्राकृतोऽपि पुरुषः सर्वः स्त्रीजनसंसदि । स्तौति गर्वायते चापि स्वमात्मानं न संशयः ॥ २७ ॥ देवीने कहा—नाथ! अत्यन्त गँवार पुरुष भी क्यों न हो, प्रायः सभी स्त्रियोंके बीचमें अपनी प्रशंसाके गीत गाते और अपनी श्रेष्ठतापर गर्व करते हैं—इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ २७ ॥
श्रीभगवानुवाच
नात्मानं स्तौमि देवेशि पश्य मे तनुमध्यमे । यं स्रक्ष्यामि वरारोहे यागार्थे वरवर्णिनि ॥ २८ ॥ श्रीभगवान् शिव बोले—देवेश्वरि! तनुमध्यमे! वरारोहे! वरवर्णिनि! मैं अपनी प्रशंसा नहीं करता हूँ। मेरा प्रभाव देखो। जिसके कारण तुम्हें दुःख हुआ है, उस यज्ञको नष्ट करनेके लिये मैं जिस वीर पुरुषकी सृष्टि कर रहा हूँ' उसपर दृष्टिपात करो ॥ २८ ॥
इत्युक्त्वा भगवान् पत्नीमुमां प्राणैरपि प्रियाम् । सोऽसृजद् भगवान् वक्त्राद् भूतं घोरं प्रहर्षणम् ॥ २९ ॥ अपने प्राणोंसे भी अधिक प्यारी पत्नी उमासे ऐसी बात कहकर भगवान् महेश्वरने अपने मुखसे एक अद्भुत एवं भयंकर प्राणीको प्रकट किया, जो उनका हर्ष बढ़ानेवाला था ॥ २९ ॥
तमुवाचाक्षिप मखं दक्षस्येति महेश्वरः । ततो वक्त्राद् विमुक्तेन सिंहेनैकेन लीलया ॥ ३० ॥ देव्या मन्युव्यपोहार्थं हतो दक्षस्य वै क्रतुः । महेश्वरने उस पुरुषको आज्ञा दी—'वीर! तुम दक्षके यज्ञका नाश कर दो।' फिर तो भगवान्के मुखसे निकले हुए उस सिंहके समान पराक्रमी एक ही वीरने पार्वतीदेवीके दुःख और क्रोधका निवारण करनेके लिये खेलही खेलमें प्रजापति दक्षके उस यज्ञका विध्वंस कर डाला ॥ ३० १/२ ॥
मन्युना च महाभीमा महाकाली महेश्वरी ॥ ३१ ॥