भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1856, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1856

वीरभद्र इति ख्यातो रुद्रकोपाद् विनिःसृतः ॥ ५३ ॥ भद्रकालीति विख्याता देव्याः कोपाद् विनिःसृता । प्रेषितौ देवदेवेन यज्ञान्तिकमिहागतौ ॥ ५४ ॥ मेरा नाम वीरभद्र है। रुद्रदेवके क्रोधसे मेरा प्राकट्य हुआ है। यह नारी भद्रकालीके नामसे विख्यात है और देवी पार्वतीके कोपसे प्रकट हुई है। देवाधिदेव महादेवने हम दोनोंको यहाँ भेजा है। इसलिये हम दोनों इस यज्ञके निकट आये हैं॥ ५३-५४ ॥ शरणं गच्छ विप्रेन्द्र देवदेवमुमापतिम् । वरं क्रोधोऽपि देवस्य वरदानं न चान्यतः ॥ ५५ ॥ विप्रवर! तुम देवाधिदेव उमावल्लभ भगवान् शिवकी शरणमें जाओ। महादेवजीका क्रोध भी परम मंगलमय है और दूसरोंसे मिला हुआ वरदान भी मंगलकारक नहीं होता ॥ ५५ ॥ वीरभद्रवचः श्रुत्वा दक्षो धर्मभृतां वरः । तोषयामास स्तोत्रेण प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ ५६ ॥ वीरभद्रकी यह बात सुनकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ दक्षने भगवान् शिवके उद्देश्यसे प्रणाम करके निम्नांकित स्तोत्रके द्वारा उनकी स्तुति की— ॥ ५६ ॥ प्रपद्ये देवमीशानं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् । महादेवं महात्मानं विश्वस्य जगतः पतिम् ॥ ५७ ॥ ‘जो सम्पूर्ण जगत्के शासक, पालक, महान् आत्मा, नित्य, सनातन, अविकारी और आराध्यदेव हैं, उन महादेवजीकी आज मैं शरण लेता हूँ’ ॥ ५७ ॥ प्राणापानौ संनिरुध्य वक्त्रस्थानेन यत्नतः । विचार्य सर्वतो दृष्टिं बहुदृष्टिरमित्रजित् ॥ ५८ ॥ सहसा देवदेवेशो ह्यग्निकुण्डात् समुत्थितः । बिभ्रत्सूर्यसहस्रस्य तेजः संवर्तकोपमः ॥ ५९ ॥ स्मितं कृत्वाब्रवीद् वाक्यं ब्रूहि किं करवाणि ते । तब अनेक नेत्रोंवाले, शत्रुविजयी, महादेव अपने मुखोंद्वारा यत्नपूर्वक प्राण और अपान वायुको अवरुद्ध करके सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टिपात करते हुए सहसा अग्निकुण्डसे निकल पड़े। प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी स्वरूपसे सहस्रों सूर्योंकी प्रभा धारण किये वे दक्षके सामने खड़े हो गये और मुसकराकर बोले—‘प्रजापते! बोलो, मैं आज तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ’ ॥ ५८-५९ १/२ ॥ श्राविते च मखाध्याये देवानां गुरुणा ततः ॥ ६० ॥ तमुवाचाञ्जलिं कृत्वा दक्षो देवं प्रजापतिः । भीतशङ्कितवित्रस्तः सबाष्पवदनेक्षणः ॥ ६१ ॥ यदि प्रसन्नो भगवान् यदि चाहं भवत्प्रियः ।