भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1855

लगे ॥ ४६ ॥ रुद्रकोपान्महाकायाः कालाग्निसदृशोपमाः । क्षोभयन् सुरसैन्यानि भीषयन्तः समन्ततः ॥ ४७ ॥ वे विशालकाय भूत रुद्रदेवके क्रोधसे कालाग्निके समान होकर देवताओंकी सेनाओंको चारों ओरसे डराने और क्षुब्ध करने लगे ॥ ४७ ॥ क्रीडन्ति विविधाकाराश्चिक्षिपुः सुरयोषितः । रुद्रक्रोधात् प्रयत्नेन सर्वदेवैः सुरक्षितम् ॥ ४८ ॥ तं यज्ञमदहच्छीघ्रं रुद्रकर्मा समन्ततः । अनेक प्रकारकी आकृतिवाले वे रुद्रगण खेलते-कूदते और देवांगनाओंको दूर फेंक देते थे। यद्यपि सम्पूर्ण देवताओंने मिलकर प्रयत्नपूर्वक उस यज्ञकी रक्षा की थी तथापि रुद्रकर्मा वीरभद्रने रुद्रदेवके क्रोधसे प्रेरित हो सब ओरसे शीघ्र ही उसे जलाकर भस्म कर दिया ॥ ४८ १/२ ॥ चकार भैरवं नादं सर्वभूतभयंकरम् ॥ ४९ ॥ छित्त्वा शिरो वै यज्ञस्य ननाद च मुमोद च । तत्पश्चात् उसने ऐसी भीषण गर्जना की, जो समस्त प्राणियोंके मनमें भय उत्पन्न करनेवाली थी। फिर उसने यज्ञका सिर काटकर बड़े जोरसे सिंहनाद किया और मन-ही-मन आनन्दका अनुभव किया ॥ ४९ १/२ ॥ ततो ब्रह्मादयो देवा दक्षश्चैव प्रजापतिः ॥ ५० ॥ ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे कथ्यतां को भवानिति । तब ब्रह्मा आदि देवता तथा प्रजापति दक्ष—ये सब के-सब हाथ जोड़कर बोले—‘देवदेव! कहिये, आप कौन हैं?’ ॥ ५० १/२ ॥

वीरभद्र उवाच

नाहं रुद्रो न वा देवी नैव भोक्तुमिहागतः ॥ ५१ ॥ देव्या मन्युकृतं मत्वा क्रुद्धः सर्वात्मकः प्रभुः । **वीरभद्रने कहा—**ब्रह्मन्! मैं न तो रुद्र हूँ, न देवी हूँ और न यहाँ भोजन करनेके लिये ही आया हूँ। तुम्हारा यह यज्ञ देवी पार्वतीके रोषका कारण बन गया है—ऐसा जानकर सर्वात्मा भगवान् शिव कुपित हो उठे हैं ॥ ५१ १/२ ॥ द्रष्टुं वा नैव विप्रेन्द्रान् नैव कौतूहलेन वा ॥ ५२ ॥ तव यज्ञविघातार्थं सम्प्राप्तं विद्धि मामिह । मैं यहाँ आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका दर्शन करने या कौतूहलवश इस यज्ञका तमाशा देखनेके लिये नहीं आया हूँ। तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि मैं तुम्हारे इस यज्ञका विनाश करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ ॥