महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1854, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंऋषयो न प्रकाशन्ते न देवा न च मानुषाः ।
एवं तु तिमिरीभूते निर्दहन्त्यपमानिताः ।। ४० ।।
उस समय आग नहीं जलती थी, सूर्यका प्रकाश फीका पड़ गया; ग्रह, नक्षत्र और
चन्द्रमा भी निस्तेज हो गये। इस प्रकार वहाँ चारों ओर अँधेरा छा गया। देवता, ऋषि और
मनुष्य—सभी छिप गये—कोई दिखायी नहीं देते थे। दक्षसे अपमानित हुए रुद्रगण
यज्ञशालामें सब ओर आग लगाने लगे ।। ३९-४० ।।
प्रहरन्त्यपरे घोरा यूपानुत्पाटयन्ति च ।
प्रमर्दन्ति तथा चान्ये विमर्दन्ति तथा परे ।। ४१ ।।
दूसरे भयंकर भूत उसी यज्ञके सदस्योंको पीटने लगे। कुछ यूप उखाड़ने लगे। बहुतेरे
रुद्रगण यज्ञकी सामग्रीको कुचलने और रौंदने लगे ।। ४१ ।।
आधावन्ति प्रधावन्ति वायुवेगा मनोजवाः ।
चूर्णयन्ते यज्ञपात्राणि दिव्यान्याभरणानि च ।। ४२ ।।
वायु और मनके समान वेगशाली कितने ही पार्षद इधर-उधर दौड़ लगाने लगे। कुछ
लोग यज्ञके उपयोगमें आनेवाले पात्रों तथा दिव्य आभूषणोंको चूर-चूर कर रहे थे ।। ४२ ।।
विशीर्यमाणा दृश्यन्ते तारा इव नभस्तले ।
दिव्यान्नपानभक्ष्याणां राशयः पर्वतोपमाः ।। ४३ ।।
उनके बिखरकर गिरते हुए टुकड़े आकाशमें छिटके हुए तारोंके समान दिखायी देते थे।
उस यज्ञभूमिमें जहाँ-तहाँ दिव्य अन्न, पान और भक्ष्य पदार्थोंके पर्वतों-जैसे ढेर दिखायी देते
थे ।। ४३ ।।
क्षीरनद्योऽथ दृश्यते घृतपायसकर्दमाः ।
दधिमण्डोदका दिव्याः खण्डशर्करवालुकाः ।। ४४ ।।
दूधकी दिव्य नदियाँ वहाँ बहती दीखती थीं, घी और खीरकी कीच जम गयी थी, दही
और मट्ठा पानीकी तरह बह रहे थे तथा खाँड़ और शक्कर वहाँ बालूकी भाँति बिछ गये
थे ।। ४४ ।।
षड् रसान् निवहन्त्येता गुडकुल्या मनोरमाः ।
उच्चावचानि मांसानि भक्ष्याणि विविधानि च ।। ४५ ।।
ये सब नदियाँ षड्रस भोजन प्रवाहित कर रही थीं। गुड़के रसकी छोटी-छोटी मनोरम
नहरें दृष्टिगोचर होती थीं। नाना प्रकारके फलोंके गूदे और भाँति-भाँतिके भक्ष्य-पदार्थ
प्रस्तुत किये गये थे ।। ४५ ।।
पानकानि च दिव्यानि लेह्यचोष्याणि यानि च ।
भुञ्जते विविधैर्वक्त्रैर्विलम्पन्त्याक्षिपन्ति च ।। ४६ ।।
दिव्य पेय पदार्थ, लेह्य और चोष्य आदि जो-जो भोजन वहाँ उपलब्ध हुए, उन सबको
वे रुद्रगण अपने विविध मुखोंद्वारा खाने, नष्ट करने और चारों ओर छींटने तथा फेंकने