महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसम्प्रगृह्य महाबाहुर्भुजं चन्दनभूषितम् ।
शैलस्तम्भोपमं शौरिरुवाचाभिविनोदयन् ॥ ६ ॥
महाबाहु गोविन्दने युधिष्ठिरकी पत्थरके बने हुए खम्भे-जैसी चन्दनचर्चित भुजाको हाथमें लेकर उनका मनोरंजन करते हुए इस प्रकार बोलना आरम्भ किया ॥ ६ ॥
शुशुभे वदनं तस्य सुदंष्ट्रं चारुलोचनम् ।
व्याकोशमिव विस्पष्टं पद्मं सूर्य इवोदिते ॥ ७ ॥
उस समय सुन्दर दाँतों और मनोहर नेत्रोंसे युक्त उनका मुखारविन्द सूर्योदयके समय पूर्णतः विकसित हुए कमलके समान शोभा पा रहा था ॥ ७ ॥
वासुदेव उवाच
मा कृथाः पुरुषव्याघ्र शोकं त्वं गात्रशोषणम् ।
न हि ते सुलभा भूयो ये हतास्मिन् रणाजिरे ॥ ८ ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**पुरुषसिंह! तुम शोक न करो। शोक तो शरीरको सुखा देनेवाला होता है। इस समरांगणमें जो वीर मारे गये हैं, वे फिर सहज ही मिल सकें, यह सम्भव नहीं है ॥ ८ ॥
स्वप्नलब्धा यथा लाभा वितथाः प्रतिबोधने ।
एवं ते क्षत्रिया राजन् ये व्यतीता महारणे ॥ ९ ॥
राजन्! जैसे सपनेमें मिले हुए धन जगनेपर मिथ्या हो जाते हैं, उसी प्रकार जो क्षत्रिय महासमरमें नष्ट हो गये हैं, उनका दर्शन अब दुर्लभ है ॥ ९ ॥
सर्वेऽप्यभिमुखाः शूरा विजिता रणशोभिनः ।
नैषां कश्चित् पृष्ठतो वा पलायन् वापि पतितः ॥ १० ॥
संग्राममें शोभा पानेवाले वे सभी शूरवीर शत्रु का सामना करते हुए पराजित हुए हैं। उनमेंसे कोई भी पीठपर चोट खाकर या भागता हुआ नहीं मारा गया है ॥
सर्वे त्यक्त्वाऽऽत्मनः प्राणान् युद्ध्य्वा वीरा महामृधे ।
शस्त्रपूता दिवं प्राप्ता न तान् शोचितुमर्हसि ॥ ११ ॥
सभी वीर महायुद्धमें जूझते हुए अपने प्राणोंका परित्याग करके अस्त्र-शस्त्रोंसे पवित्र हो स्वर्गलोकमें गये हैं, अतः तुम्हें उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥
क्षत्रधर्मरताः शूरा वेदवेदाङ्गपारगाः ।
प्राप्ता वीरगतिं पुण्यां तान् न शोचितुमर्हसि ॥ १२ ॥
मृतान् महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव पृथिवीपतीन् ।
क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहनेवाले, वेद-वेदांगोंके पारंगत वे शूरवीर नरेश पुण्यमयी वीर-गतिको प्राप्त हुए हैं। पहलेके मरे हुए महानुभाव भूपतियोंका चरित्र सुनकर तुम्हें अपने उन बन्धुओंके लिये भी शोक नहीं करना चाहिये ॥ १२ १/२ ॥