महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 189, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।। १३ ।।
सृञ्जयं पुत्रशोकार्तं यथायं नारदोऽब्रवीत् ।
इस विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जैसा कि इन देवर्षि नारदजीने पुत्र-शोकसे पीड़ित हुए राजा सृञ्जयसे कहा था ।। १३१/२ ।।
सुखदुःखैरहं त्वं च प्रजाः सर्वाश्च सृञ्जय ।। १४ ।।
अविमुक्ता मरिष्यामस्तत्र का परिदेवना ।
‘सृञ्जय! मैं, तुम और ये समस्त प्रजावर्गके लोग कोई भी सुख और दुःखोंके बन्धनसे मुक्त नहीं हुए हैं तथा एक दिन हम सब लोग मरेंगे भी। फिर इसके लिय शोक क्या करना है? ।। १४१/२ ।।
महाभाग्यं पुरा राज्ञां कीर्त्यमानं मया शृणु ।। १५ ।।
गच्छावधानं नृपते ततो दुःखं प्रहास्यसि ।
‘नरेश्वर! मैं पूर्ववर्ती राजाओंके महान् सौभाग्यका वर्णन करता हूँ। सुनो और सावधान हो जाओ। इससे तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा ।। १५१/२ ।।
मृतान् महानुभावांस्त्वं श्रुत्वैव पृथिवीपतीन् ।। १६ ।।
शममानय संतापं शृणु विस्तरशश्च मे ।
‘मरे हुए महानुभाव भूपतियोंके नाम सुनकर ही तुम अपने मानसिक संतापको शान्त कर लो और मुझसे विस्तारपूर्वक उन सबका परिचय सुनो ।। १६१/२ ।।
क्रूरग्रहाभिशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ।। १७ ।।
अग्रियाणां क्षितिभुजामुपादानं मनोहरम् ।
‘उन पूर्ववर्ती राजाओंका श्रवण करनेयोग्य मनोहर वृत्तान्त बहुत ही उत्तम, क्रूर ग्रहोंको शान्त करनेवाला और आयुको बढ़ानेवाला है ।। १७१/२ ।।
आविक्षितं मरुत्तं च मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।। १८ ।।
यस्य सेन्द्राः सवरुणा बृहस्पतिपुरोगमाः ।
देवा विश्वसृजो राज्ञो यज्ञमीयुर्महात्मनः ।। १९ ।।
‘सृञ्जय! हमने सुना है कि अविक्षित्के पुत्र वे राजा मरुत्त भी मर गये, जिन महात्मा नरेशके यज्ञमें इन्द्र तथा वरुणसहित सम्पूर्ण देवता और प्रजापतिगण बृहस्पतिको आगे करके पधारे थे ।। १८-१९ ।।